50 साल तक नहीं बना पुल तो ग्रामीणों ने खुद जुटाया चंदा, श्रमदान से तैयार कर दिया 60 फीट लंबा लोहे का ब्रिज
पश्चिम चंपारण के बगहा में ग्रामीणों ने सरकारी इंतजार छोड़ चंदा और श्रमदान से 60 फीट लंबा लोहे का पुल बना दिया। करीब 50 वर्षों से पुल की मांग पूरी नहीं होने पर गांव वालों ने खुद पहल की।
News Tv India हिंदी Official | Verified Expert • 27 Mar, 2026Editor
Jul 10, 2026 • 7:16 AM
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50 साल तक नहीं बना पुल तो ग्रामीणों ने खुद जुटाया चंदा, श्रमदान से तैयार कर दिया 60 फीट लंबा लोहे का ब्रिज
पश्चिम चंपारण के बगहा में ग्रामीणों ने सरकारी इंतजार छोड़ चंदा और श्रमदान से 60 फीट लंबा लोहे का पुल बना दिया। करीब 50 वर्षों से पुल की मांग पूरी नहीं होने पर गांव वालों ने खुद पहल की।
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10 July 2026
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50 साल तक नहीं बना पुल तो ग्रामीणों ने खुद जुटाया चंदा, श्रमदान से तैयार कर दिया 60 फीट लंबा लोहे का ब्रिज
परवेज आलम / बगहा (पश्चिम चंपारण) : कहते हैं, "जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है।" बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के रामनगर प्रखंड के एक छोटे से गांव ने इस कहावत को सच कर दिखाया है। वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाने के बाद भी जब पुल नहीं बना, तो ग्रामीणों ने इंतजार छोड़ खुद ही समाधान निकाल लिया। लोगों ने चंदा जुटाया, श्रमदान किया और करीब ढाई लाख रुपये की लागत से पहाड़ी नदी पर 60 फीट लंबा लोहे का पुल तैयार कर दिया।
आज यह पुल सिर्फ दो किनारों को नहीं, बल्कि हजारों लोगों की उम्मीदों और संघर्ष को जोड़ रहा है।
यह मामला रामनगर प्रखंड की सोनखर पंचायत स्थित शिवपुर कॉलोनी का है। यहां पहाड़ी नदी कई गांवों के बीच संपर्क का एकमात्र रास्ता है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले करीब 50 वर्षों से इस स्थान पर स्थायी पुल बनाने की मांग की जा रही थी, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला।
बरसात के मौसम में नदी उफान पर आ जाती थी और बांस-बल्लियों से बना अस्थायी चचरी पुल बह जाता था। इसके बाद गांव का संपर्क पूरी तरह टूट जाता था।
पुल नहीं होने का सबसे अधिक असर स्कूली बच्चों, किसानों, महिलाओं और मरीजों पर पड़ता था। बच्चों को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती थी। खेतों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था और गंभीर मरीजों को अस्पताल ले जाना किसी चुनौती से कम नहीं था।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार ऐसी स्थिति भी बनी जब मरीजों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका।
गांव ने मिलकर जुटाया चंदा, फिर शुरू हुआ श्रमदान
सरकारी मदद नहीं मिलने पर गांव के लोगों ने सामूहिक बैठक की और स्वयं पुल बनाने का फैसला लिया।
किसी ने 100 रुपये का सहयोग दिया, किसी ने 1,000 रुपये, तो कई लोगों ने मजदूरी और श्रमदान किया। कुछ ग्रामीणों ने लोहे और निर्माण सामग्री उपलब्ध कराई। देखते ही देखते करीब ढाई लाख रुपये इकट्ठा हो गए और ग्रामीणों ने दिन-रात मेहनत कर मजबूत लोहे का पुल तैयार कर दिया।
अब हजारों लोगों को मिल रही राहत
नया पुल बनने के बाद अब आसपास के गांवों के लोगों को आवागमन में बड़ी राहत मिली है। स्कूली बच्चों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी, किसानों को खेतों तक पहुंचने में आसानी होगी और बरसात के दौरान गांव का संपर्क भी नहीं टूटेगा।
ग्रामीणों का कहना है कि अब किसी मरीज को अस्पताल ले जाने के दौरान नदी पार करने का डर नहीं रहेगा।
व्यवस्था पर भी खड़े हुए सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से पुल बनाने की मांग की, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार गांव के लोगों को खुद आगे आना पड़ा।
यह पहल जहां ग्रामीणों की एकजुटता और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गई है, वहीं यह विकास कार्यों और बुनियादी सुविधाओं को लेकर व्यवस्था पर भी कई सवाल खड़े करती है।
आज पूरे इलाके में हो रही चर्चा
रामनगर के शिवपुर गांव की यह पहल अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है। लोग इसे सामूहिक भागीदारी और जनसहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण बता रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समाज एकजुट हो जाए तो बड़ी से बड़ी चुनौती का समाधान निकाला जा सकता है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना केवल जनता की जिम्मेदारी रह गई है?
क्यों खास है यह खबर?
यह सिर्फ एक पुल बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस जज्बे की मिसाल है जिसमें ग्रामीणों ने सरकारी इंतजार छोड़ अपने दम पर विकास का रास्ता तैयार किया। पश्चिम चंपारण का यह छोटा सा गांव आज पूरे राज्य के लिए आत्मनिर्भरता और सामुदायिक एकता का प्रेरक उदाहरण बन गया है।