पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा, बिना वैध तलाक दूसरा विवाह कानूनी नहीं; 498A के तहत कार्रवाई अमान्य

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिना विधिक तलाक के किया गया दूसरा विवाह कानूनी मान्यता नहीं रखता। ऐसे संबंध में संबंधित पुरुष को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत ‘पति’ मानकर अभियोजन नहीं चलाया जा सकता।

Feb 11, 2026 - 14:39
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा, बिना वैध तलाक दूसरा विवाह कानूनी नहीं; 498A के तहत कार्रवाई अमान्य
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा, बिना वैध तलाक दूसरा विवाह कानूनी नहीं; 498A के तहत कार्रवाई अमान्य

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिना विधिक तलाक के किया गया दूसरा विवाह कानूनी मान्यता नहीं रखता। ऐसे संबंध में संबंधित पुरुष को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत ‘पति’ मानकर अभियोजन नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने फिरोजपुर के मजिस्ट्रेट द्वारा कथित पति के खिलाफ जारी समन आदेश को निरस्त कर दिया।

मामले के अनुसार, एक महिला ने फिरोजपुर की अदालत में शिकायत दायर कर आरोप लगाया था कि उसका विवाह हरजिंदर सिंह से हुआ और विवाह के बाद उससे दहेज की मांग की गई। शिकायत में कहा गया कि डोली के समय कार की मांग रखी गई तथा बाद में उसके परिजनों ने तीन लाख रुपये भी दिए। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि इसके बावजूद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और मारपीट की गई। इन आरोपों के आधार पर मजिस्ट्रेट ने आरोपी के विरुद्ध समन जारी किए थे।

समन आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की गई, किंतु वह खारिज हो गई। इसके बाद याची ने वरिष्ठ अधिवक्ता सलिल देव सिंह बाली के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची की ओर से अदालत को बताया गया कि शिकायतकर्ता का पूर्व में वर्ष 2005 में गुरमीत सिंह से विवाह हुआ था। वर्ष 2013 में दोनों के बीच तलाक की याचिका दायर की गई थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था।

सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि तलाक की कार्यवाही में महिला ने स्वयं स्वीकार किया था कि गुरमीत सिंह से पहले उसका विवाह लखविंदर सिंह से हुआ था। दोनों ही विवाहों में विधिवत तलाक नहीं हुआ था। ऐसे में याची की ओर से तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता का विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ था, इसलिए वह किसी अन्य व्यक्ति से वैध विवाह नहीं कर सकती। परिणामस्वरूप, उसे याची की वैध पत्नी नहीं माना जा सकता और धारा 498-ए के तहत कार्रवाई नहीं बनती।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति शालिनी नागपाल ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए का उद्देश्य पति या उसके परिजनों द्वारा विवाहित महिला के साथ दहेज उत्पीड़न की स्थिति में कानूनी संरक्षण प्रदान करना है। हालांकि इस धारा में ‘पति’ शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, किंतु सामान्य विधिक अर्थ में यह शब्द हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विधिवत संपन्न विवाह से जुड़े पुरुष के लिए प्रयुक्त होता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला या पुरुष ने अपने पूर्व विवाह का विधिक रूप से समापन नहीं किया है, तो उसके पश्चात किया गया विवाह शून्य (void) माना जाएगा और उसे कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं होगी। ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को कानून की दृष्टि में ‘पति’ का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

इन तथ्यों और विधिक प्रावधानों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। यह फैसला विवाह संबंधी कानूनी वैधता और दहेज उत्पीड़न मामलों में धारा 498-ए के दायरे को स्पष्ट करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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