स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर यौन शोषण का आरोप और साजिश का दावा
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ है। जानें क्या है पूरा विवाद और शंकराचार्य ने इसे क्यों बताया एक बड़ा षड्यंत्र।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद: आस्था, आरोप और षड्यंत्र की पूरी कहानी
इन दिनों स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक गंभीर कानूनी विवाद के केंद्र में हैं। प्रयागराज के झूंसी थाने में उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत मामला दर्ज किया गया है। यह विवाद वेद पाठी छात्रों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है, जिसकी जांच अब अदालत के आदेश पर की जा रही है।
आरोपों के बीच एक नया मोड़
इस मामले में उस समय एक नया मोड़ आया जब शाहजहाँपुर के रमाशंकर दीक्षित अपनी पत्नी और बेटियों के साथ वाराणसी स्थित आश्रम पहुँचे। उन्होंने दावा किया कि कुछ लोगों ने उनसे संपर्क किया था और लालच दिया था कि अगर वे स्वामी जी पर यौन उत्पीड़न का झूठा आरोप लगा दें, तो उन्हें बड़ी आर्थिक मदद दी जाएगी रमाशंकर का कहना है कि उन्हें केवल एक शपथ पत्र (एफिडेविट) पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से साफ मना कर दिया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पलटवार
शंकराचार्य ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपने खिलाफ रचा गया एक बड़ा षड्यंत्र बताया है उनका कहना है कि उन्हें बदनाम करने और कानूनी जाल में फंसाने की कोशिश की जा रही है।
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सबूत की मांग: उन्होंने चुनौती दी है कि अगर किसी के पास कोई वीडियो सीडी या ठोस सबूत है, तो उसे सार्वजनिक किया जाए।
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अदालत पर भरोसा: स्वामी जी का कहना है कि मुकदमा दर्ज होना उचित है, क्योंकि जांच के बाद ही सच्चाई सबके सामने आएगी और फर्जी केस बनाने वालों को सजा मिल सकेगी।
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जल्द फैसले की अपील: उन्होंने अदालत से गुजारिश की है कि इस मामले की सुनवाई तेजी से की जाए ताकि सच जल्द से जल्द बाहर आ सके
राजनीति और आस्था का टकराव
यह मामला अब केवल कानूनी नहीं रह गया है, बल्कि इसमें राजनीतिक रंग भी घुल गया है। शंकराचार्य ने इस पूरे प्रकरण को लेकर वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं ।
इस विवाद ने लोगों की आस्था और विश्वास को भी झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ अदालत के आदेश पर दर्ज प्राथमिकी (FIR) है और दूसरी तरफ झूठे आरोप लगाने के लिए दिए गए कथित प्रलोभन का दावा। ऐसे में सच्चाई क्या है, इसका फैसला अब सोशल मीडिया पर नहीं बल्कि अदालत में पेश किए गए सबूतों और तथ्यों के आधार पर होगा।
यह मामला न केवल एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जुड़ा है, बल्कि हमारी पूरी न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है।