विधानसभा में गूंजी रविंद्र सिंह भाटी की आवाज: "सरहद के रक्षक परेशान और कंपनियां मालामाल, ये कैसा न्याय?
शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने राजस्थान विधानसभा में पश्चिमी राजस्थान की समस्याओं को उठाया। उन्होंने DNP क्षेत्र, ओरण संरक्षण और कंपनियों को भूमि आवंटन पर सरकार से जवाब मांगा।
राजस्थान विधानसभा के बजट सत्र में उस समय माहौल गरमा गया जब शिव विधानसभा क्षेत्र के निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने पश्चिमी राजस्थान के ज्वलंत मुद्दों पर सरकार को घेरा। राजस्व चर्चा के दौरान भाटी ने सरहद की सुरक्षा, जमीन की बंदरबांट और स्थानीय लोगों के संघर्ष को लेकर बेहद कड़े और भावुक सवाल उठाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरहदी इलाकों के मूल निवासियों की अनदेखी जारी रही, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
"लैंड बैंक" बनी पश्चिमी राजस्थान की धरती
विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने सरकार की भूमि आवंटन नीति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर और फलौदी जैसे जिलों को केवल एक 'लैंड बैंक' समझ लिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) को लाखों बीघा जमीन थाली में सजाकर दे रही है, जबकि वहां की मिट्टी का असली हकदार आज भी अपने आशियाने के लिए तरस रहा है।
भाटी ने सवाल उठाया कि पहले जमीन आवंटन के लिए ग्राम पंचायत की अनुमति अनिवार्य होती थी, लेकिन अब सारे अधिकार जयपुर में केंद्रित कर दिए गए हैं। उन्होंने पूछा, "क्या स्थानीय जनता और पंचायतों की राय की अब कोई कीमत नहीं बची?"
ओरण और गोचर: विरासत पर संकट
भाटी ने सदन में ओरण और गोचर भूमि के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि राजस्थान में लगभग 25 हजार ओरण हैं, जो 6 लाख हेक्टेयर में फैले हैं। उन्होंने कहा:
• पशुधन का आधार: ये जमीनें केवल खाली मैदान नहीं हैं, बल्कि प्रदेश के लाखों पशुओं के चरने की जगह हैं।
• विरासत का अंत: अगर ओरण और गोचर खत्म हो गए, तो राजस्थान की 'देसी घी और दूध' की पहचान भी मिट जाएगी।
• गरीबों पर गाज: रामगढ़ के 80 परिवारों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर गरीबों के घर उजाड़ना किसी भी तरह से न्यायपूर्ण नहीं है।
DNP क्षेत्र: 45 साल से सुविधाओं का अकाल
डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समस्याओं पर भाटी ने सरकार को आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि 1980 से लागू कड़े नियमों के कारण आज भी सैकड़ों गांव विकास से कोसों दूर हैं।
• वहां न सड़क है, न बिजली और न ही मोबाइल नेटवर्क।
• यहां तक कि प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ भी नियमों की पेचीदगियों के कारण वहां के लोगों को नहीं मिल पा रहा है।
उन्होंने पूछा कि एक तरफ कंपनियों के लिए नियम लचीले किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ सीमा की रक्षा करने वाले ग्रामीणों को बुनियादी हक क्यों नहीं दिए जा रहे?
सीमावर्ती गांवों का पलायन: सुरक्षा पर बड़ा खतरा
भाटी ने राघवा, सोनू और पारेवर जैसे गांवों का जिक्र करते हुए आगाह किया कि सुविधाओं के अभाव में लोग अपने पुश्तैनी गांव छोड़कर जा रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि सरहद पर बसे ये गांव खाली हो गए, तो देश की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होगी। जो लोग सीमा पर तैनात होकर देश की रक्षा करते हैं, आज वे खुद अपनी पहचान और जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
रविंद्र सिंह भाटी की सरकार से 5 मुख्य मांगें
विधायक ने सदन के माध्यम से सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं:
1. सख्त नीति: ओरण और गोचर भूमि के बचाव के लिए एक स्पष्ट कानून बने।
2. आवंटन पर रोक: कंपनियों को दी जा रही जमीन के अंधाधुंध आवंटन को तुरंत रोका जाए।
3. विशेष पैकेज: DNP क्षेत्र के लोगों के लिए बुनियादी सुविधाओं का एक विशेष पैकेज लाया जाए।
4. खेजड़ी संरक्षण: राज्य वृक्ष खेजड़ी को बचाने के लिए केवल आदेश नहीं, बल्कि एक सख्त अध्यादेश (Ordinance) लाया जाए।
5. पुनर्वास: घुमंतू समुदायों (बंजारा, गाड़िया लोहार, रबारी) को रहने के लिए जमीन दी जाए।
भाटी ने अंत में कहा कि यह उनकी निजी लड़ाई नहीं बल्कि राजस्थान की अस्मिता का सवाल है। अगर सरकार ने जल्द समाधान नहीं निकाला, तो सरहद के लोग अपना हक मांगने के लिए जयपुर की सड़कों पर उतरेंगे।