बलूचिस्तान की 'अम्मा हूरी' का निधन: बेटे की वापसी का 14 साल का इंतजार मौत के साथ हुआ खत्म
बलूचिस्तान में लापता लोगों के लिए संघर्ष करने वाली 80 वर्षीय अम्मा हूरी का निधन। 2012 से गायब बेटे गुल मोहम्मद मर्री की तलाश में वह 14 साल तक सड़कों पर रहीं।
क्वेटा : बलूचिस्तान में अपनों की तलाश में सड़कों पर उतरने वाली माताओं के संघर्ष का एक चेहरा 'अम्मा हूरी' अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 16 फरवरी को 80 वर्ष की आयु में अम्मा हूरी का निधन हो गया। उनके जीवन का अंतिम पल भी उसी उम्मीद में बीता कि शायद उनका लापता बेटा घर लौट आए, लेकिन 14 साल का यह लंबा इंतजार उनकी मौत के साथ ही खत्म हुआ।
संघर्ष और दर्द की कहानी
अम्मा हूरी केवल एक मां नहीं थीं, बल्कि वे बलूचिस्तान की उन सैकड़ों माताओं की आवाज बन चुकी थीं, जिनके बच्चे वर्षों से लापता हैं। उनके बेटे गुल मोहम्मद मर्री को कथित तौर पर साल 2012 में जबरन गायब कर दिया गया था। तब से लेकर अपनी आखिरी सांस तक अम्मा हूरी ने सरकार और प्रशासन से केवल एक ही सवाल किया—"मेरा बेटा कहां है?"
शनिवार को सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अम्मा हूरी का संघर्ष अब बलूच समाज की राजनीतिक चेतना का एक बड़ा हिस्सा बन गया है। उन्होंने पाकिस्तानी राज्य की नीतियों और 'सामूहिक दंड' जैसी स्थितियों का सामना करते हुए न्याय की गुहार लगाई।
सड़कों और धरनों पर बीती उम्र
80 साल की बुजुर्ग अवस्था में भी अम्मा हूरी का जज्बा कम नहीं हुआ था। उन्होंने न्याय पाने के लिए सामाजिक बाधाओं को तोड़ा और:
• विरोध प्रदर्शन: वे क्वेटा के विरोध प्रदर्शनों और इस्लामाबाद की कड़कड़ाती ठंड में लगने वाले धरनों में हमेशा शामिल रहीं।
• अदालतों के चक्कर: अपने बेटे की बरामदगी के लिए उन्होंने थानों से लेकर अदालतों तक के चक्कर काटे।
• कैंपों में उपस्थिति: 'वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स' के चेयरमैन नसरुल्लाह बलूच ने बताया कि वह अक्सर अपनी पोती (लापता बेटे की बेटी) के साथ लापता व्यक्तियों के कैंप में आती थीं।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ आखिरी संदेश
अम्मा हूरी के निधन के बाद सोशल मीडिया पर उनका एक छोटा वीडियो खूब साझा किया जा रहा है। वीडियो में उनका दर्द साफ झलक रहा है। वह कह रही हैं:
"मेरे बेटे की कोई खबर नहीं है। वह जिंदा है या मर चुका है, मुझे नहीं पता। मैं 14 साल से सड़कों पर हूं... अब मैं बूढ़ी हो गई हूं। लोग मुझे वाहन से उतरते समय सहारा देते हैं, लेकिन मैं फिर भी यहां विरोध करने आती हूं ताकि मुझे न्याय मिल सके।"
बलूचिस्तान में 'जबरन गुमशुदगी' का मुद्दा
बलूचिस्तान में 'जबरन गुमशुदगी' (Forced Disappearances) एक बहुत बड़ा और संवेदनशील मुद्दा है। स्थानीय लोगों और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि हजारों बलूच युवाओं को सुरक्षा बलों द्वारा उठा लिया गया है, जिनका कोई सुराग नहीं मिलता। हालांकि, पाकिस्तानी सरकार और राज्य संस्थाएं इन आरोपों को अक्सर खारिज करती रही हैं।
अम्मा हूरी की कहानी बलूचिस्तान की उन अनगिनत माताओं की दास्तां बयां करती है, जो अपने बच्चों की फोटो हाथ में लिए सड़कों पर बैठी हैं। अम्मा हूरी तो चली गईं, लेकिन उनकी अधूरी आस और संघर्ष का संदेश अब बलूचिस्तान के हर घर तक पहुंच चुका है।