पुलिस की 'गढ़ी हुई' कहानी पर कोर्ट का डंडा, ड्रग्स केस में राजेश उर्फ काला को मिला संदेह का लाभ

चंडीगढ़ की स्पेशल अदालत ने 2020 के ड्रग्स मामले में आरोपी को बरी कर दिया। पुलिस जांच में खामियों और केस प्रॉपर्टी की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवालों के चलते मिला संदेह का लाभ।

Feb 12, 2026 - 16:05
पुलिस की 'गढ़ी हुई' कहानी पर कोर्ट का डंडा, ड्रग्स केस में राजेश उर्फ काला को मिला संदेह का लाभ
पुलिस की 'गढ़ी हुई' कहानी पर कोर्ट का डंडा, ड्रग्स केस में राजेश उर्फ काला को मिला संदेह का लाभ

चंडीगढ़: चंडीगढ़ की एक स्पेशल कोर्ट ने एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत दर्ज करीब पांच साल पुराने एक मामले में आरोपी राजेश कुमार उर्फ काला को बरी कर दिया है। अदालत ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए माना कि 'केस प्रॉपर्टी' (बरामद नशीला पदार्थ) की सुरक्षा और पुलिस अधिकारियों की गवाही में गहरा विरोधाभास है, जिसका सीधा लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।

क्या था मामला? यह मामला 9 जनवरी 2020 का है, जब थाना सेक्टर-11 की पुलिस ने दावा किया था कि सेक्टर-25/38 लाइट पॉइंट के पास से आरोपी राजेश कुमार को 10.70 ग्राम हेरोइन और 14 बुप्रेनॉरफिन इंजेक्शन के साथ गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 21 और 22 के तहत मामला दर्ज किया था।

अदालत की सख्त टिप्पणी: 'संदिग्ध है सील और कस्टडी' ट्रायल के दौरान जब बचाव पक्ष के वकीलों ने जिरह की, तो पुलिस की कहानी की परतें खुलने लगीं। जांच अधिकारी ने अदालत में यह स्वीकार किया कि केस प्रॉपर्टी को खोला गया था, लेकिन इस महत्वपूर्ण जानकारी का जिक्र न तो चार्जशीट में था और न ही धारा 161 के तहत दर्ज बयानों में। अदालत ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब केस प्रॉपर्टी की सील और उसकी सुरक्षित कस्टडी ही स्पष्ट नहीं है, तो निष्पक्ष जांच पर संदेह होना स्वाभाविक है।

पुलिस गवाही में तालमेल का अभाव बचाव पक्ष के वकील तरमिंदर सिंह, मधु वाणी और मनजिंदर सिंह ने दलील दी कि पुलिस ने अपनी मर्जी से कहानी गढ़ी। अदालत ने भी पाया कि पुलिस गवाहों के बयानों में सामंजस्य की भारी कमी थी। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने यह भी साबित किया कि आरोपी को कथित गिरफ्तारी के समय से कई घंटे पहले ही उठा लिया गया था, जिसके गवाहों को पुलिस ने जांच का हिस्सा ही नहीं बनाया।

स्पेशल कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को "संदेह से परे" साबित करने में विफल रहा है, जिसके चलते आरोपी को बाइज्जत बरी किया जाता है।

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