पठानकोट में बोले मोहन भागवत: केवल सीमा की रक्षा नहीं, सामाजिक एकता भी है राष्ट्रीय सुरक्षा

आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने पठानकोट में पूर्व सैन्य अधिकारियों के साथ संवाद किया। उन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए 'पंच परिवर्तन' और सामाजिक एकता का मंत्र दिया।

Feb 26, 2026 - 06:47
पठानकोट में बोले मोहन भागवत: केवल सीमा की रक्षा नहीं, सामाजिक एकता भी है राष्ट्रीय सुरक्षा
पठानकोट में बोले मोहन भागवत: केवल सीमा की रक्षा नहीं, सामाजिक एकता भी है राष्ट्रीय सुरक्षा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मंगलवार को पठानकोट के किरण ऑडिटोरियम में एक विशेष संवाद गोष्ठी को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सेना के सेवानिवृत्त कमीशंड अधिकारी शामिल हुए। डॉ. भागवत ने पूर्व सैन्य अधिकारियों के साथ राष्ट्रहित, सुरक्षा और सामाजिक सुधारों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम की शुरुआत 'वन्दे मातरम्' के सामूहिक गायन के साथ हुई। इस दौरान ऑडिटोरियम में 'वन्दे मातरम्' के इतिहास और तीनों सेनाओं के परमवीर चक्र विजेताओं के जीवन पर आधारित एक प्रेरणादायी प्रदर्शनी भी लगाई गई।

संघ को जानना है तो उसके कार्य को समझें

अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने संघ की कार्यप्रणाली और इसके उद्देश्यों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संघ को दूर से देखने के बजाय उसके कार्यों को करीब से समझना जरूरी है। मुख्य बातें:

  • निस्वार्थ सेवा: संघ किसी प्रतिस्पर्धा या प्रचार के लिए काम नहीं करता, बल्कि राष्ट्रहित को सबसे ऊपर रखता है।

  • सत्ता का मोह नहीं: उन्होंने साफ किया कि सत्ता या लोकप्रियता हासिल करना संघ का उद्देश्य नहीं है।

  • समाज का हिस्सा: संघ समाज से अलग कोई संस्था नहीं है, बल्कि यह समाज का ही एक संगठित रूप है। वर्तमान में संघ देश भर में 1.30 लाख से अधिक सेवा कार्यों का संचालन कर रहा है।

'पंच परिवर्तन' से सशक्त होगा भारत

डॉ. भागवत ने 'पंच परिवर्तन' का उल्लेख करते हुए समाज के लिए पांच महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का पालन ही देश को मजबूत बनाता है।

  1. सामाजिक समरसता: समाज में भेदभाव खत्म कर एकता बढ़ाना।

  2. पारिवारिक मूल्य: संयुक्त परिवार व्यवस्था को बनाए रखना, जो भारतीय समाज की असली ताकत है।

  3. पर्यावरण संरक्षण: संतुलित जीवनशैली अपनाना और प्रकृति की रक्षा करना।

  4. स्वदेशी की भावना: आत्मनिर्भरता के लिए स्थानीय और घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देना।

  5. नागरिक कर्तव्य: प्रत्येक नागरिक द्वारा अपनी जिम्मेदारियों का पूरी निष्ठा से पालन करना।

पर्यावरण और स्वदेशी पर जोर

यह कार्यक्रम अपने आप में एक उदाहरण था क्योंकि इसमें सिंगल-यूज़ प्लास्टिक और फ्लेक्स बैनरों का बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया गया था। डॉ. भागवत ने संतुलित जीवनशैली पर जोर दिया। स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रम स्थल पर गौ सेवा संस्थान और ग्रामीण उत्पादों के स्टॉल भी लगाए गए थे। उन्होंने कहा कि स्वदेशी अपनाना न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा का व्यापक नजरिया

राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपने विचार रखते हुए सरसंघचालक ने कहा कि केवल सीमाओं की सुरक्षा करना ही काफी नहीं है। देश को सुरक्षित रखने के लिए सामाजिक एकता, आर्थिक मजबूती और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का होना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने सेना के अनुशासन और समर्पण जैसे गुणों को समाज में भी अपनाने की सलाह दी।

कार्यक्रम के अंत में एक प्रश्नोत्तर सत्र भी हुआ, जिसमें पूर्व सैन्य अधिकारियों ने वर्तमान विषयों पर सवाल पूछे और डॉ. भागवत ने उनके विस्तार से उत्तर दिए। समारोह का समापन सामूहिक राष्ट्रगान के साथ हुआ, जिससे पूरे सभागार में देशभक्ति का माहौल बन गया।

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