बंगाल में 'श्यामा प्रसाद' के सपनों की वापसी: आखिर कैसे ढहा ममता का किला? राष्ट्रवाद और बंगाली गौरव की जीत की इनसाइड स्टोरी
जब देश की राजनीति में 'वंदेमातरम्' गाने पर विवाद छिड़ा था और बंगाली भद्रलोक के प्रतीकों पर खींचतान चल रही थी, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि 4 मई, 2026 की दोपहर पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा नया अध्याय लिखेगी जो 'अप्रत्याशित' होगा।
News Tv India हिंदी Official | Verified Expert • 27 Mar, 2026Editor
May 4, 2026 • 3:41 PM | New Delhi
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बंगाल में 'श्यामा प्रसाद' के सपनों की वापसी: आखिर कैसे ढहा ममता का किला? राष्ट्रवाद और बंगाली गौरव की जीत की इनसाइड स्टोरी
जब देश की राजनीति में 'वंदेमातरम्' गाने पर विवाद छिड़ा था और बंगाली भद्रलोक के प्रतीकों पर खींचतान चल रही थी, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि 4 मई, 2026 की दोपहर पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा नया अध्याय लिखेगी जो 'अप्रत्याशित' होगा।
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बंगाल में 'श्यामा प्रसाद' के सपनों की वापसी: आखिर कैसे ढहा ममता का किला? राष्ट्रवाद और बंगाली गौरव की जीत की इनसाइड स्टोरी
बंगाल में 'भगवा' सूर्योदय: जहां बलिदान हुए मुखर्जी, वहां खिला 'कमल'; राष्ट्रवाद की पिच पर ऐसे बोल्ड हुईं ममता
कोलकाता/नई दिल्ली : जब देश की राजनीति में 'वंदेमातरम्' गाने पर विवाद छिड़ा था और बंगाली भद्रलोक के प्रतीकों पर खींचतान चल रही थी, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि 4 मई, 2026 की दोपहर पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा नया अध्याय लिखेगी जो 'अप्रत्याशित' होगा। भाजपा ने आज बंगाली गौरव, संस्कृति और भद्रलोक के हर प्रतीक को अपने साथ जोड़कर वह कर दिखाया, जो अब तक इस राज्य में असंभव माना जा रहा था।
सत्ता की 'शर्मीली' फितरत और रचा गया इतिहास
पश्चिम बंगाल के बारे में कहा जाता है कि यहाँ सत्ता बहुत 'शर्मीली' है; वह बार-बार चेहरे नहीं बदलती। 1947 से 1967 तक कांग्रेस, फिर वामपंथियों का 34 साल का अखंड राज और उसके बाद 15 साल तक ममता बनर्जी। लेकिन 2026 ने इस रवायत को तोड़ दिया है।
बीजेपी का 'तीन तिगाड़ा, काम बनाया'
भाजपा ने पिछले तीन वर्षों में राजनीति के उन 'तीन दुर्गों' को फतह किया है, जहाँ जीत को नामुमकिन माना जाता था:
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2026: पश्चिम बंगाल में पहली बार 'कमल' खिलाकर इतिहास रच दिया। राजनीति में 'तीन' को अक्सर अशुभ माना जाता है, लेकिन भाजपा ने 'ऑड' (Odd) परिस्थितियों के खिलाफ 'इवेन' (Even) परिणाम देकर खुद को श्रेष्ठ साबित किया है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: बंकिमचंद्र से विवेकानंद तक का साथ
बीजेपी ने बंगाल की मिट्टी के इमोशन और सेंटीमेंट को बखूबी समझा। बंकिम चंद्र चटर्जी, राजा राम मोहन राय, रविन्द्र नाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और सुभाष चंद्र बोस जैसे नायकों को भाजपा ने अपनी राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स का आधार बनाया।
जड़ें बाहरी नहीं, मिट्टी से जुड़ी हैं
चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने बार-बार यह संदेश दिया कि वे 'बाहरी' नहीं हैं। उनकी जड़ें श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उन विचारों में हैं, जिन्होंने बंगाल को बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) का हिस्सा बनने से बचाया था।
कश्मीर से बंगाल तक: घुसपैठ और डेमोग्राफी का मुद्दा
श्यामाप्रसाद मुखर्जी अखंड भारत के पैरोकार थे और कश्मीर में परमिट सिस्टम के विरोधी थे। भाजपा ने उनके इसी सूत्र 'एक निशान, एक विधान, एक प्रधान' को बंगाल की घुसपैठ से जोड़कर पेश किया।
वोटर के मन में 'सुरक्षा' का भाव
प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार बंगाल के मतदाताओं को आगाह किया कि घुसपैठ के कारण राज्य की डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) बदल रही है। गृहमंत्री ने याद दिलाया कि अगर मुखर्जी न होते, तो बंगाल आज बांग्लादेश का हिस्सा होता। इस नैरेटिव ने मतदाताओं के मन में एक गंभीर सुरक्षात्मक सोच पैदा की, जिसका असर वोटिंग प्रतिशत और ध्रुवीकरण के रूप में स्पष्ट दिखा।
नमाज-हिजाब बनाम जय श्री राम: ध्रुवीकरण की अंतिम जंग
बीजेपी ने पूरे अभियान के दौरान ममता बनर्जी की सरकार को 'हिंदू विरोधी' और 'मुस्लिम समर्थक' साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
जय श्री राम पर गुस्सा: जब ममता बनर्जी ने इस नारे पर नाराजगी जताई, तो भाजपा ने इसे 'हिंदू अस्मिता' का अपमान बताया।
रामनवमी और हिजाब राजनीति: 2023-24 की रामनवमी हिंसा और ममता बनर्जी की 'हिजाब' जैसी दिखने वाली तस्वीरों को भाजपा ने चुनावी हथियार बनाया।
बंगाल की जनता ने इस बार केवल विकास ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक सुरक्षा और पहचान के नाम पर मतदान किया। वामपंथ के पुराने गढ़ में 'सेंट्रल लाइन पॉलिटिक्स' को दरकिनार कर 'राइट विंग' का झंडा फहराना भारतीय राजनीति के बदलते मिजाज की सबसे बड़ी गवाही है।