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मानसून और नौतपा: समझिए भारत की जीवनरेखा और गर्मी के प्रचंड दिनों का क्या है कनेक्शन?
भारत में मौसम की अपनी एक लय है, जिसमें मानसून और नौतपा की महत्वपूर्ण भूमिका है। दक्षिण-पश्चिम मानसून जहां देश के लिए जीवनरेखा समान है, वहीं नौतपा साल के सबसे गर्म दिनों का प्रतीक। आज, 25 मई से नौतपा की शुरुआत हो रही है, आइए समझते हैं इन दोनों मौसमी घटनाओं को और इनके आपसी संबंध को।
News Tv India हिंदी Official | Verified Expert • 27 Mar, 2026Editor
May 25, 2025 • 7:20 AM
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मानसून और नौतपा: समझिए भारत की जीवनरेखा और गर्मी के प्रचंड दिनों का क्या है कनेक्शन?
भारत में मौसम की अपनी एक लय है, जिसमें मानसून और नौतपा की महत्वपूर्ण भूमिका है। दक्षिण-पश्चिम मानसून जहां देश के लिए जीवनरेखा समान है, वहीं नौतपा साल के सबसे गर्म दिनों का प्रतीक। आज, 25 मई से नौतपा की शुरुआत हो रही है, आइए समझते हैं इन दोनों मौसमी घटनाओं को और इनके आपसी संबंध को।
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मानसून और नौतपा: समझिए भारत की जीवनरेखा और गर्मी के प्रचंड दिनों का क्या है कनेक्शन?
नई दिल्ली: भारत में मौसम की अपनी एक लय है, जिसमें मानसून और नौतपा की महत्वपूर्ण भूमिका है। दक्षिण-पश्चिम मानसून जहां देश के लिए जीवनरेखा समान है, वहीं नौतपा साल के सबसे गर्म दिनों का प्रतीक। आज, 25 मई से नौतपा की शुरुआत हो रही है, आइए समझते हैं इन दोनों मौसमी घटनाओं को और इनके आपसी संबंध को।
क्या है दक्षिण-पश्चिम मानसून और क्यों है ये इतना महत्वपूर्ण?
दक्षिण-पश्चिम मानसून एक विशाल मौसमी घटना है जो हर साल जून से सितंबर के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में झमाझम बारिश लेकर आता है। यह बारिश सिर्फ पानी की बूंदें नहीं, बल्कि भारत की कृषि, जल स्रोतों और समग्र अर्थव्यवस्था की धुरी है। इसका जन्म भूमि और समुद्र के तापमान में होने वाले अंतर से होता है। गर्मी में जब भारतीय भूभाग तपता है, तो हिंद महासागर से उठी नमी से लदी हवाएं भारत की ओर खिंची चली आती हैं। जब ये हवाएं हिमालय जैसी पर्वतीय बाधाओं से टकराती हैं, तो ऊपर उठकर ठंडी होती हैं और बारिश के रूप में बरस जाती हैं। यह दक्षिण-पश्चिम मानसून है, जो उत्तर-पूर्व मानसून (जो主に दक्षिण-पूर्वी भारत को प्रभावित करता है) से अलग है।
कैसे भारत की ओर बढ़ता है मानसून? जानें कोरिओलिस इफेक्ट
गर्मियों के दौरान, उत्तर भारत में एक निम्न दबाव का क्षेत्र बन जाता है, जबकि हिंद महासागर में उच्च दबाव होता है। यह दबाव का अंतर ही समुद्र से नम हवाओं (दक्षिण-पश्चिम हवाओं) को भारत की भूमि की ओर धकेलता है। ये हवाएं अपने साथ भारी मात्रा में नमी लाती हैं, जो बादलों का निर्माण करती हैं और वर्षा का कारण बनती हैं।
एक दिलचस्प पहलू है 'कोरिओलिस इफेक्ट'। जब ये हवाएं भूमध्य रेखा को पार करती हैं, तो पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के कारण वे सीधी न आकर दाहिनी ओर (उत्तरी गोलार्ध में) मुड़ जाती हैं। इसी कारण जो हवाएं दक्षिण-पूर्व से आ रही होती हैं, वे भारत तक पहुंचते-पहुंचते दक्षिण-पश्चिम दिशा से आने लगती हैं, और इसीलिए इसे 'दक्षिण-पश्चिम मानसून' कहा जाता है।
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अरब सागर शाखा: यह शाखा पश्चिमी तट की ओर बढ़ती है और पश्चिमी घाट से टकराकर केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में भारी वर्षा करती है।
बंगाल की खाड़ी शाखा: यह शाखा बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर पूर्वोत्तर भारत की ओर बढ़ती है। वहां यह हिमालय की श्रृंखलाओं से टकराती है और पश्चिम की ओर मुड़कर गंगा के मैदानी इलाकों (पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली) और मध्य भारत तक बारिश पहुंचाती है।
भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था की रीढ़
मानसून को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहना अतिश्योक्ति नहीं है। देश की लगभग 55-60% कृषि भूमि सिंचाई के लिए सीधे मानसून पर निर्भर है। चावल, मक्का, कपास, सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलें पूरी तरह से मानसून की बारिश पर ही उगती हैं। यदि मानसून अच्छा होता है, तो फसलें लहलहाती हैं, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है और आर्थिक विकास को गति मिलती है। इसके विपरीत, कमजोर मानसून सूखे का कारण बनता है, जिससे फसलें बर्बाद होती हैं, महंगाई बढ़ती है, किसानों की आय घटती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
आज से 'नौतपा' शुरू, जानें क्या है मान्यता
आज, यानी 25 मई से, 'नौतपा' का आरंभ हो रहा है, जो 2 जून तक चलेगा। यह साल के वह नौ दिन माने जाते हैं जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है और गर्मी अपने चरम पर होती है। ज्योतिषीय और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इन नौ दिनों में जितनी अधिक और प्रचंड गर्मी पड़ती है, मानसून के दौरान उतनी ही अच्छी बारिश होती है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य रोहिणी नक्षत्र को 'तपाकर' मानसून के लिए ऊर्जा संचित करता है। इस दौरान सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं, जिससे तापमान बहुत बढ़ जाता है।
हालांकि, इस साल मई में अब तक गर्मी का वह प्रचंड रूप देखने को नहीं मिला है, जिसकी उम्मीद की जाती है। दक्षिण भारत के कई हिस्सों में पिछले कुछ दिनों से हो रही बारिश ने भी तापमान को नियंत्रित रखने में मदद की है। अब देखना यह है कि यह नौतपा कैसा रहता है और इसका मानसून पर क्या प्रभाव पड़ता है।
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