"काम राक्षसों के और चोला साधुओं का": शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार और प्रशासन को घेरा, उठाए गंभीर सवाल
प्रयागराज माघ मेले में हुए विवाद ने अब एक उग्र मोड़ ले लिया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें 'ब्राह्मण विरोधी' और 'लोकतंत्र विरोधी' करार दिया है। वाराणसी में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान शासन में संतों, महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा जा रहा है।
News Tv India हिंदी Official | Verified Expert • 27 Mar, 2026Editor
Jan 29, 2026 • 5:03 PM
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"काम राक्षसों के और चोला साधुओं का": शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार और प्रशासन को घेरा, उठाए गंभीर सवाल
प्रयागराज माघ मेले में हुए विवाद ने अब एक उग्र मोड़ ले लिया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें 'ब्राह्मण विरोधी' और 'लोकतंत्र विरोधी' करार दिया है। वाराणसी में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान शासन में संतों, महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा जा रहा है।
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"काम राक्षसों के और चोला साधुओं का": शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार और प्रशासन को घेरा, उठाए गंभीर सवाल
वाराणसी : प्रयागराज में माघ अमावस्या से ही प्रशासन और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है। इसी बीच शंकराचार्य का एक और बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि यहां लोगों के काम राक्षसों के हैं और चोला साधुओं का पहने बैठे हैं।
शंकराचार्य ने कहा कि संत कभी बंट नहीं सकते। संत के नाम पर जो लोग वेशधारी बनकर दिखाई देते हैं, वो अपने आप ही अलग हैं। वे असली संत नहीं हैं। ढोंगी संत और सच्चा संत हमेशा अलग होते हैं। प्रयागराज में जो लाठी चलाई गई, उसका निशाना सिर्फ असली संत नहीं थे। लाठी उन लोगों पर भी चली जो गुरुकुल में शिक्षा लेने आए थे, संन्यासियों, ब्रह्मचारियों, साध्वियों और बुजुर्गों पर भी। ये सब लोग सनातन धर्म का हिस्सा हैं। जिनको इससे पीड़ा नहीं हो रही, वे असली संत नहीं हैं, बल्कि ढोंगी संत हैं।
उन्होंने सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि पहले किसी पर हमला होता था, लेकिन महिलाओं और बच्चों को नहीं छुआ जाता था। अब ऐसा हो रहा है कि ब्राह्मण बच्चों को भी निशाना बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि प्रशासन ने इस घटना के बाद किसी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इससे यह साबित होता है कि सरकार अब ब्राह्मणों के खिलाफ नजरिया रखती है।
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि माफी मांगना या अपराध को स्वीकार करना प्रशासन के ऊपर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि संतों ने ग्यारह दिन तक संयम बनाए रखा और मौके दिए कि प्रशासन अपनी गलती सुधार सके, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसका सबूत जनता ने देखा। उन्होंने कहा कि वीडियो और फोटो ने साफ दिखा दिया कि लोगों को कैसे मारा और पीटा गया, चोटी पकड़कर अपमानित किया गया, लेकिन किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब माघ समाप्त हो गया है और संत वहां से निकल गए हैं। उन्होंने जो अहंकार दिखाया, वो सभी के सामने है। अब जनता खुद देख रही है कि प्रशासन ने संतों के साथ कैसा व्यवहार किया।
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उन्होंने मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने का मामला भी उठाया। उन्होंने कहा कि बनारस और अन्य जगहों पर मंदिरों की परंपरागत मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं और फेंकी जा रही हैं। ये औरंगजेब के समय जैसी घटना है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को औरंगजेब कहने पर कुछ संतों को गुस्सा आ रहा है और ये स्वाभाविक भी है कि जिससे आपको प्रेम या लगाव होगा, उसे कोई कुछ कहे तो आपको बुरा लगता है, लेकिन सरकार से लगाव रखने वाले इन संतों को भगवान या मंदिरों से लगाव नहीं है क्या? अगर आपको मंदिर, मूर्तियों और भगवान से लगाव है, तो उनकी हानि देखकर दर्द होना चाहिए।
उन्होंने 'कालनेमी' शब्द को लेकर कहा कि मंत्री ने उनका अपमान करने और अपनी भड़ास निकालने के लिए यह शब्द इस्तेमाल किया। अगर उनके पास इसका प्रमाण है तो लाएं और इस बात को सिद्ध करें। उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि आज कुछ लोग साधु-संतों का चोला पहने हैं और काम राक्षसों जैसा है। आज ब्राह्मणों पर हमला हो रहा है और गायों, मंदिरों और मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उन्होंने इसे सीधे तौर पर राक्षसों का काम बताया, जबकि साधु-संत धर्म और समाज के संरक्षक हैं।
उन्होंने कहा कि प्रशासन और सरकार ने संतों के खिलाफ जो कदम उठाए, वह संसद और लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। संतों को अलग-अलग करने और हिंदू समाज को विभाजित करने की कोशिश हो रही है।
उन्होंने आगे कहा कि यह सब देखकर जनता और साधु संतों का विश्वास कमजोर हुआ है। लोग अब यह सोचने लगे हैं कि देश में न्याय और लोकतंत्र पर भरोसा कैसे किया जा सकता है। प्रशासन की तानाशाही ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। सरकार ने संतों और जनता के अधिकारों का उल्लंघन किया है और जांच या कार्रवाई करने का कोई इरादा नहीं दिखाया।