7 साल में सीवर में दम घुटने से 498 सफाई कर्मचारियों की मौत, संसद में सरकार ने जारी किए आंकड़े
सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर सरकार ने लोकसभा में आंकड़े पेश किए। 2019 से जून 2026 तक सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 498 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई, जबकि मैनुअल स्कैवेंजिंग से मौत का आंकड़ा शून्य बताया गया।
Nitesh Kumar Jha Verified Public Figure • 23 Jul, 2026Editor
7 साल में सीवर में दम घुटने से 498 सफाई कर्मचारियों की मौत, संसद में सरकार ने जारी किए आंकड़े
सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर सरकार ने लोकसभा में आंकड़े पेश किए। 2019 से जून 2026 तक सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 498 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई, जबकि मैनुअल स्कैवेंजिंग से मौत का आंकड़ा शून्य बताया गया।
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05 August 2026
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7 साल में सीवर में दम घुटने से 498 सफाई कर्मचारियों की मौत, संसद में सरकार ने जारी किए आंकड़े
देश में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतें अब भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं। सरकार ने लोकसभा में बताया कि 1 जनवरी 2019 से 30 जून 2026 के बीच देशभर में 498 सफाई कर्मचारियों की सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से मौत हुई है। हालांकि, सरकार ने यह भी कहा कि इसी अवधि में 'मैनुअल स्कैवेंजिंग' के कारण एक भी मौत दर्ज नहीं हुई।
यह जानकारी सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सवाल के लिखित जवाब में दी।
राहुल गांधी ने सरकार से क्या सवाल पूछे थे?
राहुल गांधी ने लोकसभा में सरकार से सीवर सफाई और सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल पूछे थे। उन्होंने जानना चाहा कि देश में खतरनाक सफाई कार्य में कितने लोग लगे हैं, 2019 के बाद कितनी मौतें हुईं, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार 30 लाख रुपये का मुआवजा कितने परिवारों को मिला और क्या मैनुअल स्कैवेंजर मुक्त घोषित जिलों की रिपोर्ट का कोई स्वतंत्र ऑडिट कराया गया है।
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उन्होंने यह भी पूछा कि क्या सरकार ने सीवर सफाई के पूर्ण मशीनीकरण के लिए कोई समयसीमा तय की है।
आंकड़े बताते हैं- औसतन हर 11 दिन में एक मौत
सरकार द्वारा संसद में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 में सबसे अधिक 132 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई। इसके बाद 2020 में 34, 2021 में 62, 2022 में 88, 2023 में 65, 2024 में 54 और 2025 में 47 मौतें दर्ज की गईं।
वहीं, वर्ष 2026 में 30 जून तक 16 सफाई कर्मचारियों की जान जा चुकी है। इन आंकड़ों के आधार पर देखा जाए तो औसतन हर 11 दिन में एक सफाई कर्मचारी सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान अपनी जान गंवा रहा है।
30 लाख रुपये का मुआवजा कितनों को मिला?
सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में सीवर सफाई के दौरान मौत होने पर मुआवजे की राशि बढ़ाकर 30 लाख रुपये करने का निर्देश दिया था। लेकिन संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, 498 मौतों में से केवल 75 मामलों में ही 30 लाख रुपये का पूरा मुआवजा दिया गया।
सरकारी जवाब के मुताबिक 345 परिवारों को पुराने नियम के तहत 10 लाख रुपये मिले, जबकि 22 मामलों में आंशिक मुआवजा दिया गया। वहीं 56 मामलों में मुआवजे की स्थिति को लेकर सरकार के पास कोई पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
498 मौतें, फिर भी 'मैनुअल स्कैवेंजिंग' से मौत शून्य क्यों?
सरकार के जवाब में सामने आया यह अंतर कानून में मौजूद अलग-अलग परिभाषाओं से जुड़ा है। 'मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम, 2013' के तहत हाथ से मैला उठाने को मैनुअल स्कैवेंजिंग माना जाता है। सरकार का कहना है कि इस श्रेणी में किसी मौत का मामला दर्ज नहीं हुआ।
वहीं, बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर या सेप्टिक टैंक में उतरकर सफाई करना 'खतरनाक सफाई' की श्रेणी में आता है। सरकार द्वारा बताई गई 498 मौतें इसी श्रेणी से संबंधित हैं।
जिलों की 'जीरो' रिपोर्ट का नहीं हुआ स्वतंत्र ऑडिट
राहुल गांधी ने यह भी पूछा था कि जिन जिलों ने खुद को मैनुअल स्कैवेंजर मुक्त घोषित किया है, क्या उनकी रिपोर्ट का स्वतंत्र ऑडिट कराया गया है। सरकार ने अपने जवाब में कहा कि ऐसा कोई अलग ऑडिट नहीं कराया गया।
सरकार के अनुसार, 2024-25 के सर्वे में जिलों द्वारा दी गई रिपोर्ट को ही आधार माना गया। इससे पहले 2013 और 2018 के सर्वे में देशभर में 58,098 मैनुअल स्कैवेंजर चिन्हित किए गए थे, जिनमें सबसे अधिक 32,473 उत्तर प्रदेश से थे।
सीवर सफाई के मशीनीकरण की समयसीमा अब भी तय नहीं
सरकार ने अपने जवाब में सीवर सफाई के पूर्ण मशीनीकरण के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं बताई। हालांकि, केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि जुलाई 2023 में शुरू की गई 'नमस्ते योजना' के तहत अब तक 89,915 सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई कर्मचारियों का सत्यापन किया जा चुका है।
उन्होंने बताया कि इस योजना के माध्यम से सफाई कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण, मशीन खरीदने के लिए सहायता और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। हालांकि, सीवर में इंसानों के उतरने की व्यवस्था पूरी तरह कब समाप्त होगी, इस पर सरकार ने कोई समयसीमा नहीं दी।
पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब 5 वर्षों का अनुभव। अपनी बीट से जुड़ी खबरों और बदलते घटनाक्रम पर गहरी नजर रखते हैं। सटीक, तथ्यात्मक और आसान भाषा में खबरें पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं।