कौन हैं अरूप रॉय? TMC में बगावत के बीच बागी विधायकों ने बनाया नया राष्ट्रीय अध्यक्ष
टीएमसी (TMC) में अंदरूनी कलह के बीच बागी विधायकों ने ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने का दावा करते हुए अरूप रॉय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया है। आखिर कौन हैं अरूप रॉय और कैसे बना उनका राजनीतिक कद, जानिए पूरी कहानी।
News Tv India हिंदी Official | Verified Expert • 27 Mar, 2026Editor
Jun 23, 2026 • 11:01 AM | कोलकाता
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कौन हैं अरूप रॉय? TMC में बगावत के बीच बागी विधायकों ने बनाया नया राष्ट्रीय अध्यक्ष
टीएमसी (TMC) में अंदरूनी कलह के बीच बागी विधायकों ने ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने का दावा करते हुए अरूप रॉय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया है। आखिर कौन हैं अरूप रॉय और कैसे बना उनका राजनीतिक कद, जानिए पूरी कहानी।
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23 June 2026
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कौन हैं अरूप रॉय? TMC में बगावत के बीच बागी विधायकों ने बनाया नया राष्ट्रीय अध्यक्ष
कोलकाता : पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तेजी से बदलते घटनाक्रम ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। विधानसभा चुनाव में हार और सत्ता से बाहर होने के बाद तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी (TMC) के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी के कई नेताओं के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान अब बड़े संगठनात्मक बदलाव का रूप लेती दिखाई दे रही है।
सोमवार को कोलकाता में आयोजित बागी विधायकों की बैठक में ऐसा फैसला लिया गया, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। बैठक में मौजूद नेताओं ने दावा किया कि ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है और वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है।
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इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठने लगा कि आखिर अरूप रॉय कौन हैं और उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी क्यों सौंपी गई है।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर
अरूप रॉय का राजनीतिक जीवन छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। हावड़ा में जन्मे अरूप रॉय शुरुआती दिनों में कांग्रेस के छात्र संगठन से जुड़े रहे। राजनीति में सक्रियता और संगठनात्मक कौशल के कारण उन्होंने जल्द ही अपनी अलग पहचान बना ली।
साल 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी, तब अरूप रॉय उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने शुरुआत से ही उनका साथ दिया। पार्टी को मजबूत बनाने और जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने में उनकी भूमिका को हमेशा अहम माना गया।
हावड़ा की राजनीति में मजबूत पकड़
अरूप रॉय को हावड़ा जिले की राजनीति का प्रभावशाली चेहरा माना जाता है। वह हावड़ा मध्य विधानसभा सीट से लगातार चार बार विधायक चुने जा चुके हैं। वर्ष 2011, 2016, 2021 और 2026 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने जीत हासिल की।
उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लगातार अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार बनाए रखा है। टीएमसी (TMC) सरकार के दौरान उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी सौंपी गईं।
कई विभागों की संभाल चुके हैं जिम्मेदारी
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकारों में अरूप रॉय ने कृषि विपणन और सहकारिता जैसे अहम विभागों का कार्यभार संभाला। प्रशासनिक अनुभव और संगठन में मजबूत पकड़ के कारण वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी कार्यशैली उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है। वह कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद करने और स्थानीय स्तर के विवादों को सुलझाने के लिए जाने जाते हैं।
संगठन के संकटमोचक के रूप में रही पहचान
लंबे समय तक अरूप रॉय तृणमूल कांग्रेस के हावड़ा जिला अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने का काम किया।
पार्टी के भीतर जब भी किसी तरह का विवाद सामने आया, तब उन्हें समाधान निकालने वाले नेता के रूप में देखा गया। यही वजह है कि कई राजनीतिक विश्लेषक उन्हें टीएमसी (TMC) का "संकटमोचक" भी मानते रहे हैं।
बागी गुट ने घोषित किया नया संगठनात्मक ढांचा
कोलकाता में हुई बैठक के दौरान बागी नेताओं ने पार्टी के नए संगठनात्मक ढांचे की भी घोषणा की। अरूप रॉय को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, जबकि फिरहाद हकीम, रथिन घोष और सबीना यास्मीन को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।
इसके अलावा ऋतब्रत बनर्जी, जावेद खान और संदीपन साहा को महासचिव नियुक्त किया गया है। बागी नेताओं का कहना है कि यह पूरा फैसला पार्टी संविधान के अनुरूप लिया गया है और इसकी जानकारी चुनाव आयोग को भी भेजी जाएगी।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल
इस घटनाक्रम के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पार्टी के भीतर जारी मतभेद और गहरे होते हैं, तो इसका असर आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, ममता बनर्जी और उनके समर्थक गुट की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल इतना तय है कि टीएमसी (TMC) के भीतर चल रही यह उठापटक आने वाले समय में बंगाल की राजनीति की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित कर सकती है।