Northeast India: दक्षिण-दक्षिण-पूर्व एशिया का द्वार पूर्वोत्तर?
Northeast भारत दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया का रणनीतिक प्रवेश द्वार बन सकता है। विशेषज्ञों ने गुवाहाटी में आयोजित विमर्श में कनेक्टिविटी, व्यापार पर जोर
Niharika Gupta Verified Public Figure • 11 Oct, 2026Senior Sub Editor
Nov 6, 2026 - 1:14 PM | Delhi
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Niharika Gupta
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Northeast India: दक्षिण-दक्षिण-पूर्व एशिया का द्वार पूर्वोत्तर?
Northeast भारत दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया का रणनीतिक प्रवेश द्वार बन सकता है। विशेषज्ञों ने गुवाहाटी में आयोजित विमर्श में कनेक्टिविटी, व्यापार पर जोर
“Northeast India: दक्षिण-दक्षिण-पूर्व एशिया का द्वार पूर्वोत्तर?”
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06 November 2026
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Northeast India: दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया का रणनीतिक प्रवेश द्वार बन सकता है पूर्वोत्तर भारत, विशेषज्ञों ने बताई बड़ी संभावनाएं
Northeast India News: भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र आने वाले समय में दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रवेश द्वार बन सकता है। अपनी भौगोलिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़ाव और बढ़ती कनेक्टिविटी के कारण यह क्षेत्र भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय व्यापार के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। गुवाहाटी में आयोजित दो दिवसीय शैक्षणिक विमर्श में विशेषज्ञों ने यह बात कही। उन्होंने जोर दिया कि पूर्वोत्तर भारत को केवल सीमावर्ती क्षेत्र या ट्रांजिट कॉरिडोर के रूप में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आर्थिक विकास के सक्रिय केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
4 और 5 नवंबर को आयोजित इस दो दिवसीय विमर्श में कनेक्टिविटी, सीमा प्रबंधन, भू-राजनीति, आर्थिक एकीकरण और रणनीतिक अवसरों पर विस्तार से चर्चा हुई। इस कार्यक्रम का आयोजन चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) ने गिरिजानंद चौधरी विश्वविद्यालय (GCU) और असम डॉन बॉस्को विश्वविद्यालय (ADBU) के सहयोग से किया था।
Northeast भारत क्यों है रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण?
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत का Northeast क्षेत्र बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों के करीब स्थित है। यही भौगोलिक स्थिति इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सहयोग, परिवहन और सांस्कृतिक संपर्क के लिहाज से विशेष बनाती है।
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पूर्वोत्तर भारत के जरिए दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ-साथ भारत की क्षेत्रीय उपस्थिति भी मजबूत हो सकती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि इस क्षेत्र को केवल दूसरे राज्यों और देशों के बीच सामान पहुंचाने वाले रास्ते के रूप में नहीं देखना चाहिए। यहां के स्थानीय उद्योगों, कारोबारियों, युवाओं और सीमावर्ती समुदायों को भी कनेक्टिविटी परियोजनाओं का सीधा लाभ मिलना चाहिए।
बांग्लादेश के साथ बेहतर संबंधों पर जोर
गिरिजानंद चौधरी विश्वविद्यालय में आयोजित सत्र के दौरान चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने बांग्लादेश के साथ निरंतर संवाद और सहयोग को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने 'वुडपेकर अप्रोच' का उल्लेख करते हुए कहा कि धैर्य और लगातार प्रयासों के जरिए दोनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत बनाया जा सकता है। उन्होंने भारत की विदेश नीति में पूर्वोत्तर क्षेत्र के दृष्टिकोण को अधिक महत्व देने की भी वकालत की।
चर्चा में बताया गया कि बांग्लादेश के समुद्री बंदरगाह, अंतर्देशीय जलमार्ग और सीमा पार परिवहन नेटवर्क पूर्वोत्तर भारत के लिए नए व्यापारिक रास्ते खोल सकते हैं।
इसके अलावा बंगाल की खाड़ी का बढ़ता भू-राजनीतिक महत्व और क्षेत्र में बाहरी शक्तियों की भूमिका भी चर्चा का प्रमुख विषय रही।
अखौरा-अगरतला रेल लिंक और भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे पर चर्चा
दो दिवसीय विमर्श में कई महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। इनमें अखौरा-अगरतला रेल लिंक, बांग्लादेश के समुद्री बंदरगाहों तक पहुंच, अंतर्देशीय जलमार्ग और सड़क नेटवर्क प्रमुख रहे।
विशेषज्ञों ने भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना और कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना को भी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य भारत को पड़ोसी देशों और दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजारों से बेहतर तरीके से जोड़ना है। इनके प्रभावी विकास से व्यापार, परिवहन और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को गति मिल सकती है।
इसके साथ ही बांग्लादेश के रास्ते अगरतला-कोलकाता सड़क संपर्क जैसे वैकल्पिक मार्गों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे रास्ते विकसित होने से पूर्वोत्तर भारत की सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
सीमावर्ती इलाकों को सुरक्षा के साथ आर्थिक अवसरों से जोड़ने की जरूरत
असम डॉन बॉस्को विश्वविद्यालय में आयोजित दूसरे दिन के सत्र में कुलपति जोस पालेली ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को केवल सुरक्षा के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। इन्हें आर्थिक अवसरों और सामाजिक संपर्क के केंद्र के रूप में भी विकसित करने की जरूरत है।
उन्होंने सीमावर्ती समुदायों को विकास और शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण भागीदार बनाने पर जोर दिया।
विशेषज्ञों ने कहा कि पूर्वोत्तर में सीमा प्रबंधन को मजबूत बनाने के साथ सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सरल करना, परिवहन सुविधाओं को बेहतर बनाना और विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय बढ़ाना जरूरी है।
हालांकि, इस क्षेत्र में अवैध प्रवासन, मादक पदार्थों की तस्करी, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और बुनियादी ढांचे की कमी जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं। इसलिए विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होगा।
चीन की रणनीतिक मौजूदगी और सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर भी मंथन
कार्यक्रम में पूर्वोत्तर भारत से जुड़े व्यापक भू-राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने चीन की बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी, जल सुरक्षा और यारलुंग त्सांगपो नदी से जुड़ी चिंताओं को महत्वपूर्ण बताया।
इसके अलावा सिलीगुड़ी कॉरिडोर का रणनीतिक महत्व, म्यांमार और बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियां तथा सीमा पार मादक पदार्थों की तस्करी जैसे मुद्दे भी चर्चा में शामिल रहे।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण संकरा भू-भाग है। ऐसे में इसके अलावा वैकल्पिक परिवहन मार्गों का विकास रणनीतिक और आर्थिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एक्ट ईस्ट और नेबरहुड फर्स्ट नीति को मिलेगी मजबूती?
विशेषज्ञों ने भारत की एक्ट ईस्ट नीति और नेबरहुड फर्स्ट नीति को पूर्वोत्तर भारत के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया।
उनका मानना है कि इन नीतियों को प्रभावी बनाने के लिए क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं को गति देना और पड़ोसी देशों के साथ सहयोग बढ़ाना जरूरी है। बिम्सटेक जैसे क्षेत्रीय मंचों के जरिए व्यापार, परिवहन और संस्थागत सहयोग की संभावनाओं को भी मजबूत किया जा सकता है।
इसके साथ ही विशेषज्ञों ने पैरा-डिप्लोमेसी यानी स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
कहना है कि पूर्वोत्तर राज्यों को भारत की पड़ोसी देशों के साथ विदेश नीति संबंधी सहभागिता में अधिक भूमिका मिलनी चाहिए।
Northeast भारत के विकास के लिए क्या है आगे की राह?
दो दिवसीय विमर्श का निष्कर्ष रहा कि पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया का रणनीतिक प्रवेश द्वार बनाने के लिए केवल सड़क, रेल और जलमार्ग विकसित करना पर्याप्त नहीं होगा।
इसके लिए लगातार कूटनीतिक संवाद, प्रभावी सीमा प्रशासन, बेहतर संस्थागत समन्वय और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं का लाभ स्थानीय लोगों, कारोबारियों और युवाओं तक पहुंचेगा, तभी पूर्वोत्तर भारत वास्तविक अर्थों में क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग का केंद्र बन सकेगा।
कुल मिलाकर, भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र आने वाले वर्षों में व्यापार, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए केंद्र और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच बेहतर समन्वय के साथ पड़ोसी देशों का सहयोग भी बेहद अहम होगा।
Niharika Gupta Verified Public Figure • 11 Oct, 2026Senior Sub Editor
पत्रकारिता में करीब 2 वर्ष का अनुभव, newstvindia.in में बतौर सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। रियलटाइम के साथ साथ क्राइम और हेल्थ से संबंधित समाचार लिखने में विशेष रुचि है। इनसे niharika@newstvindia.in पर संपर्क किया जा सकता है।