Supreme Court : महिला पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक, SC के आदेश
Supreme Court ने दिल्ली पुलिस को महिला पत्रकार की गिरफ्तारी पर रोक लगाने का निर्देश दिया। कथित पुलिस दुर्व्यवहार की जांच के लिए कमेटी, CCTV फुटेज पर भी निर्देश
Niharika Gupta Verified Public Figure • 11 Oct, 2026Journalist
Oct 15, 2026 • 2:34 PM | Delhi
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Niharika Gupta
6 hours ago
Supreme Court : महिला पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक, SC के आदेश
Supreme Court ने दिल्ली पुलिस को महिला पत्रकार की गिरफ्तारी पर रोक लगाने का निर्देश दिया। कथित पुलिस दुर्व्यवहार की जांच के लिए कमेटी, CCTV फुटेज पर भी निर्देश
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15 October 2026
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महिला पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक
Supreme Court Female Journalists Case: दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित पुलिस दुर्व्यवहार और गिरफ्तारी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को अहम निर्देश दिए। अदालत ने एक महिला पत्रकार को गिरफ्तार नहीं करने का निर्देश दिया और मामले में CCTV फुटेज सुरक्षित रखने की जरूरत पर जोर दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कथित दुर्व्यवहार की जांच के लिए एक कमेटी गठित करने की संभावना भी जताई। इस मामले में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठे हैं।
Supreme Court ने महिला पत्रकारों की गिरफ्तारी पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने एक महिला पत्रकार को गिरफ्तारी से सुरक्षा देने की मांग उठाई। उन्होंने बताया कि दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी की शिकायत पर पत्रकार के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम यानी SC/ST Act के तहत FIR दर्ज की गई है।
मामले में दिल्ली पुलिस के ACP विवेक भगत की शिकायत का भी उल्लेख हुआ। इसके बाद अदालत ने महिला पत्रकार की गिरफ्तारी नहीं करने का निर्देश दिया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वासन दिया कि यदि पत्रकार जांच में शामिल होती है, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
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यह निर्देश मामले की जांच के बीच आया है। हालांकि, FIR में लगाए गए आरोपों और पत्रकार की ओर से पुलिस अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सच्चाई का निर्धारण जांच और कानूनी प्रक्रिया के जरिए होगा।
महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला क्या है?
यह विवाद दिल्ली में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान सामने आया। कुछ महिला पत्रकारों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन को कवर करते समय उनके साथ पुलिसकर्मियों ने दुर्व्यवहार किया और उन्हें परेशान किया गया।
Network of Women in Media, India (NWMI) ने भी पत्रकारों की सुरक्षा और कथित मनमानी हिरासत के मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। याचिका में विरोध प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों, खासकर महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग की गई।
अदालत ने इससे पहले भी प्रदर्शन को कवर कर रहे पत्रकारों के साथ व्यवहार को लेकर चिंता जताई थी। मौजूदा सुनवाई में भी यह सवाल प्रमुख रहा कि पत्रकारों को अपना काम करते समय सुरक्षा और स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जाए।
Supreme Court का जांच के लिए कमेटी बनाने पर विचार
सुप्रीम कोर्ट ने महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों की जांच के लिए एक कमेटी बनाने का संकेत दिया है। इसके लिए वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह से दो अलग-अलग सीलबंद लिफाफों में जानकारी देने को कहा गया।
पहले लिफाफे में उन महिला पत्रकारों के नाम देने को कहा गया, जिन्होंने कथित तौर पर दुर्व्यवहार या मारपीट की शिकायत की है। दूसरे लिफाफे में संभावित कमेटी के लिए सेवानिवृत्त महिला न्यायाधीशों और पुलिस अधिकारियों के नाम मांगे गए।
प्रस्तावित कमेटी का उद्देश्य आरोपों की पड़ताल करना और घटनाओं से जुड़े तथ्यों को समझना हो सकता है। हालांकि, कमेटी का औपचारिक गठन, उसकी संरचना और जांच का दायरा अदालत के अंतिम आदेश पर निर्भर करेगा।
CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश क्यों अहम है?
इस मामले में CCTV फुटेज और अन्य वीडियो रिकॉर्डिंग महत्वपूर्ण सबूत साबित हो सकते हैं। इनसे घटनास्थल पर मौजूद लोगों की गतिविधियों, पुलिस की कार्रवाई और घटनाक्रम की समय-रेखा की जांच करने में मदद मिल सकती है।
रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि समय बीतने के साथ कुछ CCTV सिस्टम में पुराना डेटा अपने आप हट सकता है या नई रिकॉर्डिंग से बदल सकता है। फुटेज उपलब्ध रहने से जांच एजेंसियों और अदालत को आरोपों की निष्पक्ष पड़ताल करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, किसी वीडियो में दिखाई देने वाली घटना को उसके पूरे संदर्भ में समझना जरूरी है। अंतिम निष्कर्ष केवल एक क्लिप के आधार पर नहीं, बल्कि सभी उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित पक्षों के बयानों को ध्यान में रखकर निकाला जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस और पत्रकारों के अधिकारों पर बहस
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शन स्थल पर पत्रकारों और रील बनाने वाले या अन्य कंटेंट क्रिएटर्स के बीच अंतर करना कई बार मुश्किल हो सकता है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि किसी महिला के साथ अभद्रता या दुर्व्यवहार नहीं होना चाहिए।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को घटनाओं की रिपोर्टिंग, वीडियो रिकॉर्डिंग और लोगों से बातचीत करनी होती है। दूसरी ओर, पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की भी होती है।
ऐसी परिस्थितियों में स्पष्ट पहचान, उचित व्यवहार और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। किसी व्यक्ति की पत्रकार के रूप में पहचान को लेकर विवाद होने पर भी शिकायतों की निष्पक्ष जांच और सभी पक्षों के अधिकारों का सम्मान महत्वपूर्ण है।
Supreme Court: आगे क्या होगा?
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अगले निर्देश, CCTV फुटेज की उपलब्धता और कथित दुर्व्यवहार के आरोपों की जांच पर नजर रहेगी। प्रस्तावित कमेटी के गठन पर फैसला और संबंधित पक्षों की दलीलें भी आगे की कार्यवाही के लिए अहम होंगी।
फिलहाल, अदालत का निर्देश एक महिला पत्रकार की गिरफ्तारी से सुरक्षा और आरोपों की जांच से संबंधित है। इसे पूरे मामले में अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। पुलिस अधिकारी और पत्रकार, दोनों पक्षों से जुड़े आरोपों का निष्पक्ष परीक्षण होना बाकी है।
यह मामला प्रेस की स्वतंत्रता, पुलिस की जवाबदेही और विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों को सामने लाता है। आने वाली सुनवाई में अदालत का रुख इन मुद्दों पर आगे की दिशा स्पष्ट कर सकता है।