Parliament Special Session 2026: संसद के विशेष सत्र को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। केंद्र सरकार अक्टूबर 2026 के अंत में संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। इस सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को फिर से आगे बढ़ाने की संभावना है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार इन प्रस्तावों को पारित कराने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए डीएमके और कुछ छोटे विपक्षी दलों से बातचीत किए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, विशेष सत्र की तारीख और विधेयकों को पेश करने का अंतिम फैसला अभी आधिकारिक रूप से घोषित नहीं हुआ है। 

अक्टूबर के अंत में बुलाया जा सकता है Parliament का विशेष सत्र

संसद के विशेष सत्र को लेकर सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार इसी महीने के आखिर में दोनों सदनों की विशेष बैठक बुलाने पर विचार कर रही है। इस दौरान महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित विधेयकों पर चर्चा हो सकती है।

रिपोर्टों में सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सरकार को इस बार जरूरी संसदीय समर्थन जुटाने की उम्मीद है। हालांकि, संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है। इसलिए सरकार विपक्षी दलों और क्षेत्रीय पार्टियों से समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है।

विशेष सत्र की तारीख तय करते समय 26 और 27 अक्टूबर को होने वाले 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के कार्यक्रम को भी ध्यान में रखे जाने की बात सामने आई है। फिलहाल संसद सचिवालय की ओर से विशेष सत्र का औपचारिक कार्यक्रम घोषित होने का इंतजार है।

महिला आरक्षण कानून क्या है?

महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अधिक अवसर देने के लिए संसद ने वर्ष 2023 में संविधान का 106वां संशोधन पारित किया था। इसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जाता है।

इस कानून में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। हालांकि, कानून के लागू होने की प्रक्रिया जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जुड़ी हुई है।

इसका अर्थ है कि कानून पारित होने के बाद भी आरक्षण को चुनावों में लागू करने के लिए संबंधित संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा करना आवश्यक है।

अब केंद्र सरकार महिला आरक्षण को लागू करने की समयसीमा और परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इस मुद्दे पर होने वाली संसदीय चर्चा का असर भविष्य के चुनावों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। 

क्या है परिसीमन और इसे लेकर विवाद क्यों?

परिसीमन का अर्थ है लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण। इसका उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या और प्रतिनिधित्व से संबंधित व्यवस्थाओं को निर्धारित करना होता है।

भारत में परिसीमन की प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के तहत होती है। प्रस्तावित 2026 के विधेयकों में लोकसभा की सीटों की अधिकतम संख्या बढ़ाने, निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण और महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं।

हालांकि, परिसीमन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद भी हैं। कुछ विपक्षी दलों ने आशंका जताई है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

दूसरी ओर, सरकार की ओर से महिला आरक्षण और संसदीय प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। विधेयकों के अंतिम स्वरूप और उनके प्रभाव का आकलन संसद में प्रस्तुत प्रावधानों के आधार पर किया जाना चाहिए। 

अप्रैल में लोकसभा में क्यों अटक गया था विधेयक?

महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित संवैधानिक संशोधन की कोशिश को अप्रैल 2026 में लोकसभा में झटका लगा था। 17 अप्रैल को संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर पाया।

संविधान संशोधन के लिए केवल सामान्य बहुमत पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है।

अप्रैल में आवश्यक समर्थन नहीं मिलने के कारण संबंधित विधेयक आगे नहीं बढ़ सका। इसके साथ जुड़े अन्य विधेयकों पर भी आगे की कार्रवाई नहीं हुई। अब सरकार नए सिरे से समर्थन जुटाकर इन प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की संभावना तलाश रही है।

डीएमके और विपक्षी दलों से बातचीत क्यों?

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र सरकार प्रस्तावित विधेयकों के लिए जरूरी समर्थन जुटाने के उद्देश्य से डीएमके और कुछ छोटे विपक्षी दलों से संपर्क कर रही है।

संविधान संशोधन के लिए आवश्यक विशेष बहुमत हासिल करना किसी भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण संसदीय चुनौती होती है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों और अन्य विपक्षी सांसदों का समर्थन विधेयक के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, किसी दल ने अंतिम रूप से समर्थन देने का फैसला किया है या नहीं, इसकी पुष्टि संबंधित पार्टी के आधिकारिक बयान से ही की जानी चाहिए। सरकार की ओर से समर्थन जुटाने की कोशिश और विधेयक का वास्तव में पारित होना दो अलग-अलग बातें हैं।

इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव संसद से निश्चित रूप से पारित हो जाएंगे।

संसद के विशेष सत्र पर अब किस बात की नजर?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि केंद्र सरकार विशेष सत्र की तारीखों की घोषणा कब करती है और क्या महिला आरक्षण तथा परिसीमन से जुड़े विधेयक वास्तव में सदन के पटल पर रखे जाते हैं।

इसके अलावा, विपक्षी दलों का रुख, विधेयकों के प्रावधानों में संभावित बदलाव और संविधान संशोधन के लिए जरूरी समर्थन भी महत्वपूर्ण रहेंगे।

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