Supreme Court Verdict: धर्म परिवर्तन पर आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला
Supreme Court ने तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन के बाद BC मुस्लिम आरक्षण देने वाले सरकारी आदेश को रद्द करने का फैसला बरकरार । जानें पूरा मामला और कोर्ट की टिप्पणी।
Niharika Gupta Verified Public Figure • 11 Oct, 2026Journalist
Oct 15, 2026 • 3:14 PM | Delhi
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Niharika Gupta
6 hours ago
Supreme Court Verdict: धर्म परिवर्तन पर आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला
Supreme Court ने तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन के बाद BC मुस्लिम आरक्षण देने वाले सरकारी आदेश को रद्द करने का फैसला बरकरार । जानें पूरा मामला और कोर्ट की टिप्पणी।
“Supreme Court Verdict: धर्म परिवर्तन पर आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला”
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15 October 2026
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Supreme Court Reservation Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (BC-M) श्रेणी के तहत आरक्षण देने से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। मामला उन लोगों को आरक्षण का लाभ देने से जुड़ा था, जिन्होंने हिंदू सामाजिक व्यवस्था से इस्लाम धर्म अपनाया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को तमिलनाडु की अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी का सदस्य नहीं माना जा सकता।
Supreme Court ने क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने जून 2026 में राज्य सरकार के 9 मार्च 2024 के सरकारी आदेश को असंवैधानिक ठहराया था।
इस आदेश के तहत पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदायों (DNC) और अनुसूचित जाति (SC) से आने वाले कुछ लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद BC-M श्रेणी में प्रमाणपत्र देने का प्रावधान किया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत के मुताबिक, किसी व्यक्ति की पिछली सामाजिक पहचान के आधार पर उसे धर्म परिवर्तन के बाद किसी दूसरी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदाय का सदस्य अपने आप नहीं माना जा सकता।
तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक सरकारी आदेश जारी किया था। इसका उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े उन लोगों को आरक्षण का लाभ जारी रखने का रास्ता देना था, जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था।
सरकार के आदेश में ऐसे लोगों को राज्य की BC-M श्रेणी के अंतर्गत समुदाय प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था की गई थी। राज्य सरकार का तर्क था कि धर्म परिवर्तन के कारण पहले से पिछड़े लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं होना चाहिए।
हालांकि, इस आदेश को अदालत में चुनौती दी गई। मद्रास हाई कोर्ट ने इसे कानूनी प्रावधानों और पहले के न्यायिक फैसलों के अनुरूप नहीं माना। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।
मामला शुरू कैसे हुआ था?
यह विवाद एक व्यक्ति की समुदाय प्रमाणपत्र संबंधी मांग से शुरू हुआ। याचिकाकर्ता समीर अहमद, जिनका पहले नाम परमासिवम बताया गया है, ने इस्लाम धर्म अपनाने के बाद मुस्लिम लेब्बई समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा था।
उनकी मांग को संबंधित राजस्व अधिकारी ने स्वीकार नहीं किया। इसके बाद उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इस मामले में बाद में तमिलनाडु सरकार का 2024 वाला आदेश भी कानूनी विवाद का हिस्सा बन गया।
हाई कोर्ट ने माना कि केवल इस्लाम अपनाने से किसी व्यक्ति को राज्य की अधिसूचित सात पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदायों में से किसी एक का सदस्य नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले को बरकरार रखा।
BC मुस्लिम आरक्षण क्या है?
तमिलनाडु में Backward Class Muslims यानी BC-M श्रेणी के लिए 3.5 प्रतिशत का अलग उप-कोटा है। यह राज्य की आरक्षण व्यवस्था का हिस्सा है और इसके अंतर्गत अधिसूचित मुस्लिम समुदायों को निर्धारित नियमों के अनुसार लाभ मिलता है।
इन समुदायों में अंसार, डेक्कनी मुस्लिम, दुबेकुला, लेब्बई, मापिल्ला, शेख और सैयद जैसे समूह शामिल हैं। इनकी पात्रता संबंधित सरकारी सूची और लागू नियमों के आधार पर निर्धारित होती है।
इस मामले में अदालत का फैसला खास तौर पर धर्म परिवर्तन के आधार पर BC-M श्रेणी में स्वतः शामिल किए जाने से संबंधित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि तमिलनाडु के सभी मुस्लिम समुदाय आरक्षण के लिए अपात्र हैं। पात्रता संबंधित समुदाय की अधिसूचित स्थिति और लागू कानूनी नियमों पर निर्भर करती है।
धर्म परिवर्तन और सामाजिक पिछड़ेपन पर अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या धर्म परिवर्तन से पहले किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति अपने आप नए धार्मिक-सामाजिक ढांचे में भी उसी आरक्षण श्रेणी का अधिकार देती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर किसी व्यक्ति को दूसरे अधिसूचित पिछड़ा वर्ग समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण के संदर्भ में भी इस प्रश्न पर विचार किया।
अनुसूचित जाति के दर्जे के मामले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के प्रावधान अलग से लागू होते हैं। इन प्रावधानों के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा धर्म संबंधी निर्धारित शर्तों से जुड़ा है। इसलिए BC-M श्रेणी और SC दर्जे के कानूनी नियमों को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।
तमिलनाडु की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?
फैसले के बाद तमिलनाडु में आरक्षण नीति और सामाजिक न्याय को लेकर बहस तेज होने की संभावना है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने फैसले पर असहमति जताते हुए राज्य सरकार से समीक्षा याचिका दाखिल करने पर विचार करने की अपील की है।
राज्य सरकार के सामने अब यह सवाल है कि फैसले के बाद आगे कौन-से कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं। समीक्षा याचिका पर निर्णय और उसकी संभावित सुनवाई अलग कानूनी प्रक्रिया होगी।