OBC Creamy Layer: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिया झटका, क्रीमी लेयर में माता-पिता की सैलरी नहीं होगी शामिल
OBC Creamy Layer Reservation: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण से जुड़े क्रीमी लेयर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने शुक्रवार, 6 नवंबर को केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही कोर्ट ने अपने पुराने फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि ओबीसी क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय माता-पिता की वेतन से होने वाली आय को शामिल नहीं किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ओबीसी आरक्षण के लाभ से जुड़े लाखों अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने कहा कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल परिवार की कुल आय के आधार पर नहीं होगा, बल्कि माता-पिता की सेवा संबंधी स्थिति और सरकारी पद को भी ध्यान में रखना होगा।
OBC Creamy Layer Case: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की केंद्र की याचिका?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस संशोधन याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें सरकार ने 11 मार्च को दिए गए फैसले को भविष्य से लागू करने की मांग की थी।
केंद्र सरकार चाहती थी कि अदालत अपने फैसले को रेट्रोस्पेक्टिव यानी पिछली तारीख से लागू करने के बजाय प्रोस्पेक्टिव यानी भविष्य की तारीख से लागू करने का निर्देश दे।
सरकार का तर्क था कि यदि फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो वर्ष 2012 से अब तक हुई कई नियुक्तियों और सेवा आवंटन पर असर पड़ सकता है। इसमें आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों के कैडर आवंटन के साथ वरिष्ठता सूची में बदलाव की आशंका भी जताई गई थी।
सरकार ने कहा था कि इससे उन कर्मचारियों पर भी प्रभाव पड़ेगा जो इस मामले में पक्षकार नहीं हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने का क्या है नियम?
ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर का मतलब ऐसे आर्थिक या सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग से है, जिसे अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
आमतौर पर लोगों के बीच यह धारणा है कि सालाना 8 लाख रुपये से अधिक आय होने पर कोई भी ओबीसी उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आ जाता है।
हालांकि, नियमों के अनुसार क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय के आधार पर नहीं किया जाता। इसमें माता-पिता की सरकारी सेवा में स्थिति और उनके पद को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता की वेतन और कृषि से होने वाली आय को निर्धारित आय सीमा की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। इसके बजाय संबंधित नियमों के तहत माता-पिता की सेवा श्रेणी और पद की स्थिति देखी जाएगी।
11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने 'भारत सरकार बनाम रोहित नाथन' मामले में ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर के मानदंडों को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया था।
अदालत ने बताया था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण स्टेटस-बेस्ड यानी पद और सेवा की स्थिति पर आधारित है। इसे पूरी तरह इनकम-बेस्ड यानी आय आधारित व्यवस्था नहीं माना जा सकता।
इसका मतलब है कि माता-पिता किस पद पर कार्यरत हैं और उनकी सेवा किस श्रेणी में आती है, यह महत्वपूर्ण होगा।
उदाहरण के तौर पर ग्रुप ए, ग्रुप बी, ग्रुप सी और ग्रुप डी के सरकारी पदों की स्थिति को संबंधित नियमों के अनुसार देखा जाएगा।
अदालत के इस स्पष्टीकरण से ओबीसी उम्मीदवारों के लिए क्रीमी लेयर निर्धारित करने की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई थी।
केंद्र सरकार ने मांगे थे दो साल, कोर्ट ने नहीं मानी मांग
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पीएसयू, बैंकों और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के पदों की तुलना सरकारी पदों से करने के लिए नई और समान नीति तैयार करने का समय मांगा था।
सरकार की मांग थी कि इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए उसे दो साल का समय दिया जाए।
दरअसल, सरकारी विभागों के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), बैंकों और निजी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों की पद संबंधी स्थिति की तुलना सरकारी सेवा से करने में व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आ सकती हैं।
इसी कारण केंद्र सरकार एक समान नीति बनाना चाहती थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन याचिका खारिज करते हुए सरकार को मांगी गई राहत नहीं दी।
OBC Reservation पर वकील वरुण ठाकुर ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता के वकील वरुण ठाकुर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि ओबीसी आरक्षण से जुड़ी विसंगतियों, खासकर क्रीमी लेयर और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से संबंधित मुद्दों को अदालत ने फिर से स्पष्ट किया है।
उन्होंने कहा कि 11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि क्रीमी लेयर का दर्जा निर्धारित करते समय वेतन और कृषि से होने वाली आय को नहीं गिना जाएगा।
इसके बावजूद केंद्र सरकार ने संशोधन याचिका दाखिल की थी। सरकार चाहती थी कि इस फैसले को केवल भविष्य से लागू किया जाए और पहले से अदालत का दरवाजा खटखटाने वाले लोगों को इसका लाभ न मिले।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद इस मामले में केंद्र सरकार की मांग स्वीकार नहीं हुई है।
OBC उम्मीदवारों के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या मतलब है?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ओबीसी आरक्षण की पात्रता निर्धारित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल माता-पिता की वेतन आय के आधार पर किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में नहीं रखा जा सकता।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि हर ओबीसी उम्मीदवार को स्वतः नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ मिल जाएगा। पात्रता का निर्धारण संबंधित सरकारी नियमों, माता-पिता की सेवा स्थिति और लागू मानदंडों के आधार पर ही होगा।
इसलिए सरकारी नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं और आरक्षण से जुड़े अभ्यर्थियों को अपने मामले में लागू आधिकारिक नियमों की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
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