मुजफ्फरपुर: देश की आजादी के लिए महज किशोर उम्र में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने वाले अमर शहीद खुदीराम बोस को मंगलवार, 11 अगस्त को उनके शहादत दिवस पर मुजफ्फरपुर में श्रद्धापूर्वक याद किया गया। सुबह करीब 4:30 बजे आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ उनके परिजनों ने भी हिस्सा लिया।
मुजफ्फरपुर की जिस जेल से खुदीराम बोस की शहादत की कहानी जुड़ी है, वहां आज भी उनकी स्मृति लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर की याद दिलाती है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, इसी जेल में 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी दी गई थी।
फांसी स्थल और प्रतिमा पर अर्पित किए श्रद्धा-सुमन
शहादत दिवस के मौके पर तिरहुत प्रमंडल के आयुक्त, तिरहुत क्षेत्र के पुलिस उप महानिरीक्षक, मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी, वरीय पुलिस अधीक्षक समेत कई प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी कार्यक्रम में मौजूद रहे।
खुदीराम बोस के परिजन भी इस मौके पर मुजफ्फरपुर पहुंचे। अधिकारियों और परिजनों ने जेल परिसर में स्थित उस सेल, फांसी स्थल और उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी, जहां उनकी शहादत की स्मृतियां आज भी जुड़ी हुई हैं।
मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल का नाम भी आज शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा है। यह स्थान स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्मृति स्थल माना जाता है।
कौन थे खुदीराम बोस?
खुदीराम बोस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन युवा क्रांतिकारियों में शामिल थे, जिन्होंने कम उम्र में ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना।
सरकारी प्रकाशनों के अनुसार उनका जन्म 1889 में बंगाल के मिदनापुर क्षेत्र में हुआ था। स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दौर में वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े और ब्रिटिश शासन के खिलाफ सक्रिय हो गए।
बंगाल विभाजन के बाद देश में राष्ट्रवादी आंदोलन तेज हो रहा था। इसी दौर में खुदीराम बोस भी क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े और ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की योजनाओं में शामिल हुए।
मुजफ्फरपुर से कैसे जुड़ा खुदीराम बोस का नाम?
1908 में ब्रिटिश अधिकारी डगलस किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने की योजना बनाई गई। किंग्सफोर्ड पहले बंगाल में तैनात थे और बाद में मुजफ्फरपुर में जिला जज के रूप में आए थे।
30 अप्रैल 1908 की रात खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किंग्सफोर्ड की बग्गी समझकर एक बग्गी पर बम फेंका। हालांकि किंग्सफोर्ड उस बग्गी में मौजूद नहीं थे। हमले में बग्गी में सवार दो यूरोपीय महिलाओं की मौत हो गई। सरकारी स्रोत भी इस घटना में किंग्सफोर्ड के बच जाने और दो महिलाओं की मौत की पुष्टि करते हैं।
इसके बाद ब्रिटिश पुलिस ने खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में रखा गया और मुकदमे के बाद फांसी की सजा सुनाई गई।
11 अगस्त 1908 को दी गई फांसी
11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दी गई। उस समय उनकी उम्र करीब 18-19 वर्ष थी। सरकारी स्रोत उन्हें भारत के सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में शामिल बताते हैं।
उनकी शहादत ने देशभर में युवाओं के बीच गहरा प्रभाव छोड़ा। कम उम्र में देश के लिए प्राण न्योछावर करने के कारण खुदीराम बोस स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक अलग पहचान बना गए।
आज भी याद की जाती है उनकी शहादत
मुजफ्फरपुर में हर साल 11 अगस्त को खुदीराम बोस के शहादत दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। जेल परिसर में मौजूद उनकी स्मृतियां इस बात की याद दिलाती हैं कि आजादी की लड़ाई में युवाओं ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी।