नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को नई दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग से द्विपक्षीय वार्ता की। यह मुलाकात कई मायनों में अहम रही यू मिन आंग ह्लाइंग ने राष्ट्रपति पद संभालने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना, जो खुद में भारत-म्यांमार संबंधों की गर्मजोशी को दर्शाता है।
बोधगया से हुई यात्रा की शुरुआत
म्यांमार के राष्ट्रपति ने अपनी भारत यात्रा की शुरुआत बौद्ध आस्था के सबसे पवित्र स्थल बोधगया से की। पीएम मोदी ने इसे विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहा कि भगवान बुद्ध के आशीर्वाद के साथ यात्रा की यह शुरुआत दोनों देशों के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव की प्रतीक है। भारत और म्यांमार दोनों की जड़ें बौद्ध सभ्यता से गहराई तक जुड़ी हैं और यह यात्रा उसी धागे को और मजबूत करती है।
नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट और हिंद-प्रशांत — तीनों नीतियों की धुरी है म्यांमार
पीएम मोदी ने अपने बयान में साफ कहा कि म्यांमार भारत की तीन प्रमुख विदेश नीतियों नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट और हिंद-प्रशांत नीति के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य देश है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सीमा म्यांमार से लगती है और दक्षिण-पूर्व एशिया तक भारत की पहुंच काफी हद तक म्यांमार के जरिए ही तय होती है। ऐसे में यह रिश्ता महज कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत की भू-राजनीतिक जरूरत भी है।
किन मुद्दों पर हुई बात?
दोनों नेताओं के बीच वार्ता व्यापक रही। व्यापार और आर्थिक सहयोग को नई गति देने पर जोर दिया गया, वहीं रेयर अर्थ्स यानी खनिज संसाधनों के क्षेत्र में साझेदारी की संभावनाएं भी तलाशी गईं। स्वास्थ्य सेवाओं में सहयोग, सड़क मार्ग और इंफ्रास्ट्रक्चर कनेक्टिविटी, म्यांमार में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में भारत की भूमिका और मानव संसाधन विकास जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इसके अलावा समुद्री सुरक्षा और साइबर सिक्योरिटी जैसे अहम क्षेत्रों में मिलकर काम करने पर भी दोनों देशों के बीच सहमति बनी।
भारत ने शांति प्रक्रिया में सहयोग का दिया भरोसा
म्यांमार इन दिनों आंतरिक संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में पीएम मोदी का यह बयान महत्वपूर्ण है कि भारत म्यांमार में शांति और संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए हर तरह की मदद देने को तैयार है। उन्होंने संघीय शासन व्यवस्था और आर्थिक विकास के क्षेत्र में भारत के अपने अनुभव साझा करने की भी पेशकश की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बैठक के बाद कहा कि भारत म्यांमार के लिए एक भरोसेमंद पड़ोसी और संकट में पहला साथी रहा है और यह भूमिका आगे भी जारी रहेगी।
क्यों अहम है यह मुलाकात?
चीन की म्यांमार में बढ़ती पैठ के बीच भारत का यह कूटनीतिक कदम खासा महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली स्पष्ट रूप से यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने पड़ोसी को किसी भी दबाव में अकेला नहीं छोड़ेगी। समुद्री सुरक्षा और साइबर सिक्योरिटी पर सहमति यह बताती है कि दोनों देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग अब नए आयाम ले रहा है। कुल मिलाकर, यह मुलाकात भारत-म्यांमार संबंधों में एक नए और अधिक सक्रिय अध्याय की शुरुआत के रूप में देखी जा सकती है।