Delhi High Court News: सौरव दास-आशुतोष रांका की याचिका वापस, जंतर-मंतर प्रदर्शन पर कोर्ट ने उठाए सवाल

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 को सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं से सवाल किया कि जब कानून में अपील और दूसरे वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध हैं, तो वे सीधे हाईकोर्ट क्यों आए हैं। सुनवाई के दौरान सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से याचिका वापस ले ली गई।

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने सुनवाई में बॉन्ड की शर्तों, जमानतदारों की पात्रता और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के अधिकारों से जुड़े कई सवाल उठाए। वहीं, छात्र संगठन AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर भी सुनवाई हुई। अदालत ने उनकी याचिका को अगले दिन सुबह 10:30 बजे सुनने की बात कही।

Delhi High Court Hearing: सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका क्यों हुई वापस?

सौरव दास और आशुतोष रांका ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत उनकी न्यायिक हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ा दी गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील अभिक चिमनी ने दलील दी कि हिरासत बढ़ाने के आदेश में कानूनी प्रक्रिया का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बार-बार पूछा कि जब संबंधित आदेश के खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष अपील या अन्य कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं, तो याचिकाकर्ताओं ने सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख क्यों किया।

इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से याचिका वापस ले ली गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है और संबंधित पक्षों को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी दलीलें रखने का अवसर मिलना चाहिए।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर हाईकोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और वहां लगाए गए बैरिकेड पार करने के आरोपों पर भी चर्चा हुई। अदालत ने सवाल किया कि जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए अधिसूचित स्थल की सूची से हटाया गया था, तब वहां जाने और बैरिकेड पार करने की परिस्थितियां क्या थीं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि बैरिकेड किसी उद्देश्य से लगाए जाते हैं। उन्हें तोड़कर आगे बढ़ने से अन्य लोगों के वहां पहुंचने और स्थिति बिगड़ने की आशंका हो सकती है।

यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान सामने आए सवालों और दलीलों के संदर्भ में थी। अदालत ने इस स्तर पर मामले में अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।

बॉन्ड उल्लंघन और जमानतदारों पर भी उठे सवाल

हाईकोर्ट की सुनवाई में बॉन्ड की शर्तों के कथित उल्लंघन और जमानतदारों को अस्वीकार किए जाने का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट का आदेश मनमाना था और हिरासत बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं थे।

वहीं, अदालत ने पूछा कि जब बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन का आरोप है, तो संबंधित मजिस्ट्रेट को कानून के तहत कार्रवाई करने का अधिकार किस हद तक है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि जमानतदारों की पात्रता का सवाल और हिरासत बढ़ाने के आदेश की वैधता अलग-अलग कानूनी मुद्दे हो सकते हैं।

अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट मुख्य रूप से यह देख सकता है कि प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं और निर्णय में ऐसी गंभीर त्रुटि तो नहीं है, जिसके कारण न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी हो जाए। तथ्यों और साक्ष्यों का विस्तृत आकलन आम तौर पर अपीलीय प्रक्रिया का हिस्सा होता है।

क्या है सौरव दास और आशुतोष रांका का पूरा मामला?

सौरव दास और आशुतोष रांका, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े नेता हैं। दोनों को 13 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए घटनाक्रम के बाद हिरासत में लिया गया था।

पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर बंद गेट और बैरिकेड पार करके उस स्थान में प्रवेश किया था, जिसे प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया था। पुलिस ने सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने के आरोप भी लगाए।

दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं ने हिरासत बढ़ाने की प्रक्रिया और मजिस्ट्रेट के आदेश पर सवाल उठाए। उनका पक्ष था कि हिरासत जारी रखने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं थे और जमानत से संबंधित प्रक्रिया का सही पालन नहीं किया गया।

इस मामले में पुलिस के आरोपों और बचाव पक्ष की दलीलों को अलग-अलग समझना जरूरी है। हाईकोर्ट की सुनवाई में उठे सवाल अपने आप में किसी पक्ष के दोषी या निर्दोष होने का अंतिम निर्धारण नहीं करते।

नेहा बोरा की याचिका पर भी सुनवाई

दिल्ली हाईकोर्ट में AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका का मामला भी सामने आया। उन्होंने दिल्ली पुलिस की ओर से 17 अक्टूबर को जारी नोटिस को चुनौती दी थी। नोटिस में उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड और एक जमानतदार प्रस्तुत करने के संबंध में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने को कहा गया था।

यह नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत जारी किया गया था। इस प्रावधान के अंतर्गत, यदि किसी व्यक्ति से शांति भंग होने की आशंका के संबंध में विश्वसनीय जानकारी मिलती है, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड मांगा जा सकता है।

नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को मार्च में शामिल होने जाते समय निवारक हिरासत में लिया गया था और 17 अक्टूबर को रिहा कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर अगले दिन सुबह 10:30 बजे सुनवाई करने की बात कही।

आगे क्या होगा?

सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका वापस लिए जाने के बाद हिरासत और बॉन्ड से जुड़े विवादों पर संबंधित कानूनी प्रक्रिया में आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी। वहीं, नेहा बोरा की याचिका पर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर भी नजर रहेगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने प्रदर्शन स्थलों के नियमों, शांति बनाए रखने के लिए जारी किए जाने वाले बॉन्ड और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की शक्तियों को लेकर कानूनी बहस को चर्चा में ला दिया है।

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