Key Highlights
- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बीजिंग में एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन के लिए मुलाकात करेंगे।
- नौ वर्षों बाद ट्रंप चीन पहुंचे हैं, यह बैठक वैश्विक व्यापार, तकनीक और पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव के लिहाज से बेहद अहम है।
- एजेंडे में व्यापारिक संबंधों को स्थिर करना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ईरान संघर्ष जैसे प्रमुख मुद्दे शामिल हैं।
ट्रंप-शी जिनपिंग की मुलाकात: वैश्विक संबंधों का नया दौर
नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गुरुवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक अहम शिखर सम्मेलन में मुलाकात करेंगे। नौ वर्षों बाद चीन पहुंचे ट्रंप इस दौरे पर शीर्ष अधिकारियों और बड़े अमेरिकी सीईओ के प्रतिनिधिमंडल के साथ बीजिंग पहुंचे हैं। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की यह बैठक वैश्विक व्यापार, तकनीक और पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच होने वाली बैठकों की यह श्रृंखला ऐसे समय में हो रही है, जब दोनों देशों के बीच “व्यापारिक युद्धविराम” लागू है। यह स्थिति पिछले वर्ष दक्षिण कोरिया के बुसान में हुई बैठक के बाद बनी थी, जहां ट्रंप द्वारा चीन पर 145 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद पैदा हुए तनाव को कम करने की कोशिश की गई थी।
चीन दौरे पर पहुंचे अमेरिकी राष्ट्रपति
अमेरिकी राष्ट्रपति दो दिवसीय शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन पहुंचे हैं। इस दौरान व्यापार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। यह वार्ता दोनों देशों के भविष्य के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों की दिशा तय कर सकती है।
द्विपक्षीय वार्ता से पहले ट्रंप का पीपुल्स ग्रेट हॉल में औपचारिक स्वागत किया जाएगा, जो चीन की राजनयिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके बाद वे ऐतिहासिक टेंपल ऑफ हेवन का दौरा भी करेंगे। गुरुवार की बैठकों के बाद ट्रंप और शी जिनपिंग एक कार्यकारी दोपहर भोज में भी शामिल होंगे, जिससे अनौपचारिक बातचीत का अवसर मिलेगा।
व्यापार और अर्थव्यवस्था पर रहेगा सबसे ज्यादा फोकस
ट्रंप और शी जिनपिंग के एजेंडे में व्यापार और आर्थिक संबंध सबसे प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं। दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी दिखाई देने लगा है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं।
व्यापारिक तनाव के चलते अमेरिकी कंपनियां अब चीन से बाहर नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर रही हैं, ताकि वे अपनी निर्भरता कम कर सकें। वहीं, चीनी कंपनियां यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर अपना कारोबार बढ़ा रही हैं, नए बाजारों की तलाश में हैं।
चीन ने अमेरिकी सोयाबीन की खरीद सीमित कर दी है और दुर्लभ खनिजों व धातुओं तक पहुंच पर भी नियंत्रण बढ़ाया है, जो कई उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर, अमेरिका ने चीन को उन्नत कंप्यूटर चिप्स मिलने से रोकने के लिए कई प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे चीन की तकनीकी प्रगति पर असर पड़ सकता है। दो दिवसीय शिखर सम्मेलन का उद्देश्य इन व्यापारिक संबंधों को और अधिक खराब होने से पहले स्थिर करना बताया जा रहा है।
ईरान संघर्ष भी रहेगा अहम मुद्दा
अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष भी ट्रंप और शी जिनपिंग की वार्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि चीन रवाना होने से पहले ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका इस लड़ाई में “जीत” हासिल करेगा और उसे चीन की मदद की आवश्यकता नहीं है।
इसके बावजूद, विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के साथ किसी संभावित समझौते के लिए अमेरिका को चीन की कूटनीतिक भूमिका की जरूरत पड़ सकती है। चीन की मध्यस्थता इस जटिल मुद्दे को सुलझाने में सहायक हो सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर चीन से बढ़ सकता है दबाव
ईरान के सबसे बड़े तेल खरीदारों में शामिल चीन पर होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के लिए दबाव बनाया जा सकता है। अमेरिका पहले ही कई चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुका है, जिन पर ईरान को तेल निर्यात में मदद करने का आरोप है।
होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी का असर वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति पर पड़ा है। यह मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस परिवहन के लिए बेहद अहम माना जाता है। इसके बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संकट की स्थिति पैदा हो गई है, जिस पर दुनिया की नजर है।