नई दिल्ली: Supreme Court  ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसमें बच्चे भी शामिल हैं। बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाना जरूरी है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता।

15 अक्टूबर 2026 को दिए गए आदेश में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लेख किया। कोर्ट ने साफ किया कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता, दोनों जरूरी हैं। सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ऐसे उपाय अपनाने चाहिए, जिनसे बच्चों को इंटरनेट का सुरक्षित इस्तेमाल करने का मौका मिल सके।

बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने का मौलिक अधिकार

Supreme Court  के अनुसार, इंटरनेट आज शिक्षा, जानकारी और अपनी बात रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऐसे में बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह वंचित करना उचित नहीं होगा।

संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है। अदालत ने इन संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल के अधिकार को महत्वपूर्ण माना।

कोर्ट ने कहा कि बच्चों को उनकी उम्र के आधार पर इंटरनेट के अधिकार से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए ऐसा रास्ता अपनाना होगा, जिससे उनके अधिकार भी सुरक्षित रहें।

इंटरनेट पर बच्चों को किन खतरों का सामना करना पड़ता है?

इंटरनेट बच्चों के लिए पढ़ाई और नई जानकारी हासिल करने का अच्छा माध्यम है। हालांकि, इसके साथ कई गंभीर जोखिम भी जुड़े हुए हैं।

बच्चों को साइबर बुलिंग, ऑनलाइन धोखाधड़ी, अनुचित सामग्री, अनजान लोगों के संपर्क और यौन शोषण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कई बार बच्चे डर या जानकारी की कमी के कारण ऐसी घटनाओं की शिकायत भी नहीं कर पाते।

Supreme Court  ने बच्चों के ऑनलाइन शोषण से जुड़ी सामग्री को रोकने और हटाने की जरूरत पर जोर दिया। अदालत का कहना है कि सुरक्षा के उपाय उन लोगों और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही पर केंद्रित होने चाहिए, जो ऐसी हानिकारक सामग्री बनाते, फैलाते या हटाने में विफल रहते हैं।

बच्चों के इंटरनेट पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखने जैसे व्यापक प्रतिबंधों पर सवाल उठाया। अदालत के मुताबिक, इंटरनेट पर मौजूद खतरों के कारण बच्चों की पहुंच पूरी तरह बंद कर देना समस्या का सही समाधान नहीं है।

ऐसा करने से बच्चों की पढ़ाई, जानकारी हासिल करने और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। साथ ही, ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करने वाले बच्चे मदद मांगने से भी डर सकते हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों को सुरक्षित रखने का मतलब उन्हें डिजिटल दुनिया से बाहर करना नहीं है। इसके बजाय हानिकारक सामग्री को हटाने, ऑनलाइन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने और बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चों के लिए उम्र के अनुसार सुरक्षा नियम नहीं बनाए जा सकते। हानिकारक सामग्री और सेवाओं पर उचित प्रतिबंध लगाने की गुंजाइश बनी रहेगी।

Supreme Court - सोशल मीडिया पर बच्चों के लिए बनेगा Child Mode?

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया अकाउंट्स में विशेष 'चाइल्ड मोड' जैसी व्यवस्था का सुझाव दिया।

इस तरह की व्यवस्था के तहत कई सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं:

  1. प्राइवेट अकाउंट: बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट डिफॉल्ट रूप से निजी रखे जा सकते हैं।
  2. अनजान लोगों से सुरक्षा:  अजनबी वयस्कों के मैसेज और संपर्क पर नियंत्रण लगाया जा सकता है।
  3. सुरक्षित कंटेंट:  बच्चों को दिखाई जाने वाली सामग्री और विज्ञापनों को उम्र के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है।
  4. पैरेंटल कंट्रोल:  माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी को महत्व दिया जा सकता है।

अदालत ने इन उपायों को लागू करने की प्रक्रिया तय करने का जिम्मा केंद्र सरकार पर छोड़ा है। इन सुझावों का उद्देश्य बच्चों को इंटरनेट के लाभों से वंचित किए बिना संभावित ऑनलाइन खतरों से बचाना है।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सरकार को क्या करना होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने केवल इंटरनेट इस्तेमाल के अधिकार पर ही जोर नहीं दिया, बल्कि बच्चों के ऑनलाइन शोषण से जुड़ी सामग्री को रोकने के लिए भी निर्देश दिए।

अदालत ने ऐसी सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए तकनीकी उपायों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया। इसमें सत्यापित सामग्री की पहचान के लिए हैश और URL आधारित व्यवस्था तथा राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने जैसे कदम शामिल हैं।

इसके अलावा, बच्चों को डिजिटल सुरक्षा के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है। स्कूलों में उम्र के अनुसार डिजिटल सुरक्षा और यौन शिक्षा, ऑनलाइन शोषण की पहचान तथा शिकायत करने के तरीकों की जानकारी देने पर भी जोर दिया गया है।

माता-पिता की भूमिका भी होगी अहम

बच्चों को इंटरनेट पर सुरक्षित रखने के लिए केवल सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी पर्याप्त नहीं है। माता-पिता और शिक्षकों को भी बच्चों को सही मार्गदर्शन देना होगा।

बच्चों को समझाना चाहिए कि वे अपनी निजी जानकारी अनजान लोगों के साथ साझा न करें। किसी संदिग्ध मैसेज, धमकी या ऑनलाइन उत्पीड़न की स्थिति में उन्हें भरोसेमंद वयस्क को तुरंत बताना चाहिए।

बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करने से वे ऑनलाइन होने वाली परेशानियों के बारे में बिना डर के बता सकते हैं। डिजिटल जागरूकता और सुरक्षित इंटरनेट इस्तेमाल की आदतें बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने में मदद कर सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या होगा असर?

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बच्चों के डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। इससे सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के सामने बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करने की जिम्मेदारी और स्पष्ट होती है।

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