नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच उर्वरकों की वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंताओं के बावजूद केंद्र सरकार का कहना है कि खरीफ सीजन 2026 में देशभर में किसानों के लिए उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई। लोकसभा में केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने बताया कि सरकार ने समय रहते कई रणनीतिक कदम उठाए, जिससे आपूर्ति शृंखला प्रभावित नहीं हुई।
सरकार के अनुसार, आपूर्ति के स्रोतों में विविधता, दीर्घकालिक आयात समझौते, कच्चे माल की सामूहिक खरीद और लगातार निगरानी की व्यवस्था के कारण खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता सामान्य बनी रही।
Kharif Season 2026 में उर्वरकों की आपूर्ति कैसे बनी रही?
लोकसभा में दिए गए बयान में जेपी नड्डा ने कहा कि भारतीय उर्वरक कंपनियों और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के बीच दीर्घकालिक व्यावसायिक समझौतों को बढ़ावा दिया गया। इसके साथ ही विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों के माध्यम से वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की पहचान की गई।
सरकार ने उद्योग समूहों के जरिए अमोनिया और सल्फर जैसे प्रमुख कच्चे माल की सामूहिक खरीद को भी प्रोत्साहित किया, जिससे बेहतर कीमत और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिली।
सरकार ने निगरानी तंत्र को किया मजबूत
सरकार के मुताबिक कृषि एवं किसान कल्याण विभाग राज्य सरकारों के साथ मिलकर हर राज्य की उर्वरक जरूरत का आकलन करता है। इसी आधार पर उर्वरक विभाग हर महीने आपूर्ति योजना तैयार करता है।
उर्वरकों की आवाजाही पर इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (IFMS) के जरिए लगातार निगरानी रखी जाती है। इसके अलावा नियमित वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से राज्यों के साथ समीक्षा कर आवश्यकता पड़ने पर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।
पश्चिम एशिया संकट का किन क्षेत्रों पर पड़ा असर?
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव का सबसे अधिक असर अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर के आयात पर देखने को मिला। वहीं वैश्विक लॉजिस्टिक्स में आई बाधाओं के कारण पोटाश (MOP) के आयात की लागत भी बढ़ी।
हालांकि सरकार का कहना है कि इन चुनौतियों के बावजूद किसानों के लिए उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित नहीं होने दी गई।
सरकार ने संसद में क्या आंकड़े दिए?
सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल 2026 से 19 जुलाई 2026 के बीच खरीफ सीजन में प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता मांग से अधिक रही।
- यूरिया की आवश्यकता 109.40 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 163.78 लाख मीट्रिक टन दर्ज की गई।
- डीएपी (DAP) की मांग 31.57 लाख मीट्रिक टन रही, जबकि उपलब्धता 39.54 लाख मीट्रिक टन बताई गई।
सरकार का कहना है कि इससे किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने में मदद मिली।
कच्चे माल की कमी से निपटने के लिए क्या कदम उठाए गए?
जेपी नड्डा ने बताया कि आइसोप्रोपाइल अल्कोहल (IPA), अमोनिया और मेथनॉल जैसे कच्चे माल की अस्थायी कमी और कीमतों में बढ़ोतरी से निपटने के लिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के साथ समन्वय किया गया। प्रोपिलीन का आवंटन बढ़ाने के साथ-साथ दवा उद्योगों के लिए अतिरिक्त अमोनिया की व्यवस्था भी की गई।
इसके अलावा घरेलू निर्माताओं और मौजूदा कारोबारियों के सहयोग से मेथनॉल के वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत विकसित किए गए, ताकि उद्योगों पर कच्चे माल की कमी का असर कम किया जा सके।
सरकार का कहना है कि इन उपायों की बदौलत खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की आपूर्ति सुचारु बनी रही और किसानों को आवश्यक मात्रा में खाद उपलब्ध कराने में किसी बड़ी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा।