नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत कर रहा है। BRICS अब दुनिया के प्रमुख बहुपक्षीय समूहों में शामिल है और इसके मंच पर वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, विकास और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है।
लेकिन BRICS की शुरुआत किसी औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में नहीं हुई थी। इसकी जड़ें साल 2001 में प्रकाशित एक आर्थिक शोध रिपोर्ट में मिलती हैं। यहीं से BRIC नाम सामने आया, जो बाद में एक कूटनीतिक मंच में बदल गया।
BRICS का फुल फॉर्म क्या है?
BRICS नाम मूल रूप से पांच अंग्रेजी शब्दों से बना है। शुरुआती BRIC में Brazil यानी ब्राजील, Russia यानी रूस, India यानी भारत और China यानी चीन शामिल थे। बाद में South Africa यानी दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के साथ इसके नाम में S शामिल हुआ और BRIC से BRICS बन गया।
आज BRICS को मुख्य रूप से उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ की आवाज से जुड़े मंच के तौर पर देखा जाता है।
BRIC नाम किसने दिया था?
BRIC शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने 2001 में किया था। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में ब्राजील, रूस, भारत और चीन को भविष्य की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में देखा था।
उस समय BRIC कोई औपचारिक संगठन नहीं था। यह मूल रूप से एक आर्थिक अवधारणा थी। लेकिन चारों देशों के बीच बढ़ते संपर्क ने इस विचार को धीरे-धीरे राजनीतिक और कूटनीतिक मंच का रूप दे दिया।
कब बना BRIC का औपचारिक मंच?
BRIC देशों के विदेश मंत्रियों की पहली अनौपचारिक बैठक 2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुई। इसके बाद चारों देशों ने नियमित रूप से साथ काम करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला BRIC शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इसके साथ BRIC एक औपचारिक राजनीतिक और आर्थिक मंच के रूप में सामने आया।
समूह का जोर वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका बढ़ाने और विकासशील देशों के साझा हितों को सामने रखने पर रहा।
दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से BRICS बना
BRIC में बड़ा बदलाव तब आया जब दक्षिण अफ्रीका को समूह में शामिल किया गया। दिसंबर 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद समूह का नाम BRICS हो गया।
2011 में चीन के सान्या में आयोजित शिखर सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका ने पहली बार पूर्ण सदस्य के तौर पर हिस्सा लिया।
इससे BRICS का भौगोलिक दायरा भी बढ़ा और अफ्रीकी महाद्वीप को समूह में प्रतिनिधित्व मिला।
2024 में हुआ बड़ा विस्तार
कई वर्षों तक पांच सदस्यों के साथ काम करने के बाद BRICS का विस्तार हुआ। जनवरी 2024 से मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के शामिल होने से समूह का आकार बढ़ा।
अर्जेंटीना को भी विस्तार प्रक्रिया में शामिल किया गया था, लेकिन बाद में उसने सदस्यता स्वीकार नहीं की।
इसके बाद BRICS ने पार्टनर देशों की व्यवस्था भी विकसित की। इससे समूह का प्रभाव सिर्फ सदस्य देशों तक सीमित न रहकर व्यापक ग्लोबल साउथ तक पहुंचाने की कोशिश हुई।
BRICS के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं?
BRICS का एक प्रमुख उद्देश्य वैश्विक आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था में विकासशील तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका मजबूत करना है।
समूह के देश अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में सुधार और विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करते रहे हैं। इसी दिशा में न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी NDB की स्थापना भी की गई।
दूसरा अहम मुद्दा आपसी व्यापार और आर्थिक सहयोग बढ़ाना है। BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की चर्चा भी लंबे समय से होती रही है।
हालांकि, इसे पूरी तरह डॉलर-मुक्त वैश्विक व्यवस्था बनाने की तत्काल योजना के रूप में देखना सही नहीं होगा। अलग-अलग BRICS देशों के आर्थिक हित और नीतियां भी एक जैसी नहीं हैं।
BRICS की आर्थिक ताकत कितनी है?
BRICS के विस्तार के साथ समूह का वैश्विक आर्थिक और जनसांख्यिकीय महत्व बढ़ा है। इसके सदस्य देशों में दुनिया की बड़ी आबादी रहती है और कई प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं इसका हिस्सा हैं।
चीन दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में है, भारत तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि रूस, सऊदी अरब, ईरान और UAE जैसे सदस्य ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं।
इसी वजह से BRICS का प्रभाव सिर्फ GDP तक सीमित नहीं है। ऊर्जा, कच्चे माल, व्यापार, सप्लाई चेन और वैश्विक दक्षिण की राजनीति में भी इसका महत्व बढ़ा है।
क्या BRICS G7 का विकल्प है?
BRICS और G7 की तुलना अक्सर की जाती है, लेकिन दोनों समूहों की प्रकृति अलग है। G7 मुख्य रूप से विकसित औद्योगिक लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जबकि BRICS का आधार उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ में व्यापक सहयोग है।
BRICS को G7 का सीधा विकल्प कहना इसलिए सही नहीं होगा। हालांकि, वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसकी बढ़ती हिस्सेदारी ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में शक्ति संतुलन को लेकर बहस जरूर तेज की है।
भारत के लिए BRICS क्यों अहम है?
भारत के लिए BRICS एक ऐसा मंच है जहां वह चीन और रूस जैसी प्रमुख शक्तियों के साथ संवाद कर सकता है और ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठा सकता है।
नई दिल्ली में होने वाला 18वां BRICS सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की मेजबानी में समूह के विस्तार, वैश्विक व्यापार, विकास, वित्तीय सहयोग और बदलती विश्व व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।
चार देशों से शुरू हुई BRIC की कहानी आज एक बड़े बहुपक्षीय मंच तक पहुंच चुकी है। आने वाले वर्षों में BRICS की असली ताकत इस बात से तय होगी कि इसके सदस्य देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद वे कितनी प्रभावी तरीके से साझा एजेंडे पर काम कर पाते हैं।