Dharmendra Pradhan Resignation : केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उनके कार्यकाल की उपलब्धियों और विवादों पर फिर चर्चा शुरू हो गई है। उनके कार्यकाल में जहां राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) को तेजी से लागू करने, CUET जैसी नई परीक्षा व्यवस्था शुरू करने और उच्च शिक्षा में कई संरचनात्मक बदलाव किए गए, वहीं NEET समेत राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर सरकार को तीखी आलोचना का भी सामना करना पड़ा।
इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर देशभर में बहस जारी है। हालांकि, सरकार की ओर से इस्तीफे के पीछे कोई आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है।
Dharmendra Pradhan Resignation: कार्यकाल में हुए ये बड़े बदलाव
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में उच्च शिक्षा और स्कूल शिक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले लागू किए गए।
सबसे बड़ा बदलाव कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET-UG) की शुरुआत को माना गया। इसका उद्देश्य देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया को अधिक समान और पारदर्शी बनाना था।
इसी दौरान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के कई प्रावधानों को लागू करने की दिशा में भी तेजी दिखाई गई। मल्टीपल एंट्री-एग्जिट सिस्टम, एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स, चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम और कौशल आधारित शिक्षा जैसे सुधार इसी अवधि में आगे बढ़े।
NCERT की नई किताबें और डिजिटल शिक्षा पर जोर
शिक्षा मंत्रालय ने NCERT की नई पुस्तकों को तैयार करने और उनकी उपलब्धता बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए। सरकार के अनुसार, छपाई क्षमता बढ़ने से किताबों की उपलब्धता में सुधार हुआ और लागत कम करने का प्रयास किया गया।
इसके साथ ही डिजिटल लर्निंग, ऑनलाइन शिक्षा और तकनीक आधारित शिक्षण मॉडल को भी बढ़ावा दिया गया।
विदेशी विश्वविद्यालयों और नियामक सुधार की पहल
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत देश में विदेशी विश्वविद्यालयों को कैंपस स्थापित करने की दिशा में भी पहल हुई। सरकार का उद्देश्य भारतीय छात्रों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा देश में उपलब्ध कराना बताया गया।
उच्च शिक्षा के नियमन को सरल बनाने के लिए भी कई प्रस्ताव सामने आए। इसी क्रम में विभिन्न नियामक संस्थाओं के ढांचे में बदलाव से जुड़े विधायी प्रयास किए गए।
NEET और परीक्षा प्रणाली को लेकर उठे सवाल
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर उठे विवाद रहे।
NEET-UG समेत कुछ परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं के आरोप लगे। इन मामलों ने लाखों छात्रों और अभिभावकों की चिंता बढ़ाई तथा परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए। कई मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप भी हुआ और परीक्षा प्रक्रिया पर व्यापक बहस छिड़ी।
अन्य नीतियों पर भी हुआ विरोध
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ अन्य फैसलों पर भी विभिन्न राज्यों, शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों ने आपत्तियां दर्ज कराईं।
त्रिभाषा नीति को लेकर विशेष रूप से तमिलनाडु समेत कुछ राज्यों में विरोध देखने को मिला। आलोचकों ने इसे भाषा नीति से जोड़कर सवाल उठाए, जबकि केंद्र सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना है।
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इसी तरह UGC Equity Regulations के मसौदे पर भी विभिन्न संगठनों ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। सरकार और आलोचकों के बीच इस विषय पर अलग-अलग मत सामने आए।
कार्यकाल उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों के लिए रहेगा याद
धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल शिक्षा क्षेत्र में कई संरचनात्मक बदलावों के लिए याद किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने, डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने और उच्च शिक्षा में सुधार की दिशा में सरकार ने कई पहल कीं।
वहीं, राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं को लेकर सामने आए विवादों ने शिक्षा मंत्रालय की कार्यप्रणाली और परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल भी खड़े किए। ऐसे में उनका कार्यकाल उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों के लिए लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा।