केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री Hardeep Puri ने रूस से कच्चे तेल की खरीद और अमेरिका के कथित दबाव को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि भारत ने रूसी तेल खरीदने के मामले में अमेरिकी दबाव महसूस नहीं किया। पुरी के मुताबिक, भारत की तेल खरीद नीति का आधार किसी दूसरे देश का दबाव नहीं, बल्कि कीमत, उपलब्धता और देश की ऊर्जा जरूरतें हैं। गोवा में आयोजित 29वें एनर्जी टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन मीट (ETM 2026) में उन्होंने सस्ते रूसी तेल की खरीद को लेकर अपनी रणनीति भी समझाई।
Hardeep Puri on Russian Oil: 'बाहर से सरदार, लेकिन काम के तरीके में बनिया'
हरदीप सिंह पुरी ने रूसी कच्चे तेल पर मिलने वाली छूट का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने इस मौके का व्यावसायिक फायदा उठाया। उन्होंने अपने अंदाज में कहा कि वह बाहर से सरदार हैं, लेकिन ऊर्जा के मामले में बनिया की तरह सोचते हैं। उनका आशय था कि तेल खरीदते समय कीमत और आर्थिक फायदे को प्राथमिकता देना जरूरी है।
पुरी ने बताया कि एक अमेरिकी सहयोगी ने भी उन्हें कम कीमत पर तेल खरीदने के अवसर का फायदा उठाने की सलाह दी थी। मंत्री के अनुसार, रूस से सस्ता तेल खरीदने का फैसला भारत के व्यावसायिक हितों के अनुरूप था।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत की रूसी तेल खरीद अंतरराष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा बाजार में चर्चा का विषय बनी हुई है। पश्चिमी देशों ने रूस की तेल आय से होने वाली कमाई सीमित करने के लिए कई प्रतिबंध लगाए थे, जबकि भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और बाजार में उपलब्ध कीमतों के आधार पर खरीद जारी रखी।
क्या अमेरिका भारत पर रूसी तेल खरीद घटाने का दबाव बना रहा है?
रूसी तेल आयात को लेकर भारत और अमेरिका के संबंधों पर कई बार सवाल उठे हैं। हालांकि, 27 अक्टूबर 2026 को गोवा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान हरदीप पुरी ने कहा कि उन्हें रूसी तेल की खरीद कम करने के लिए अमेरिका की ओर से कोई दबाव महसूस नहीं हुआ।
मंत्री ने कहा कि उन्हें कभी ऐसा दबाव महसूस नहीं हुआ और उन्हें नहीं लगता कि उनके वरिष्ठ भी इस तरह दबाव लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऊर्जा की कीमतें कम रहना अमेरिका के हित में भी है।
पुरी का बयान भारत की उस नीति को रेखांकित करता है, जिसके तहत देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बाजारों से तेल खरीदता है। सरकार का जोर भरोसेमंद आपूर्ति, प्रतिस्पर्धी कीमत और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा पर है।
रूस से सस्ता तेल खरीदने से भारत को क्या फायदा हुआ?
रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले भारत के कुल तेल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी बेहद कम थी। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध से पहले यह हिस्सेदारी करीब 0.2 प्रतिशत थी। युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने अपने तेल के लिए नए बाजार तलाशे और कई बार अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुकाबले छूट पर तेल उपलब्ध कराया।
भारत दुनिया के बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में कम कीमत पर तेल मिलना भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण रहा। सस्ता कच्चा तेल खरीदने से रिफाइनिंग की लागत कम करने और पेट्रोलियम उत्पादों के कारोबार में प्रतिस्पर्धी बने रहने का अवसर मिलता है।
हालांकि, सस्ते तेल का फायदा हमेशा एक जैसा नहीं रहता। इसकी वास्तविक लागत में परिवहन, बीमा, भुगतान की व्यवस्था, प्रतिबंधों से जुड़े जोखिम और तेल की गुणवत्ता जैसे पहलू भी शामिल होते हैं। इसलिए भारतीय रिफाइनरियां केवल एक देश के तेल पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न विकल्पों की तुलना करती हैं।
रूसी तेल की खरीद में अब क्यों हो रहा बदलाव?
हाल के महीनों में भारत के तेल आयात के स्रोतों में बदलाव देखने को मिला है। हरदीप पुरी ने बताया कि भारतीय रिफाइनरियां अब खाड़ी देशों से भी अधिक तेल खरीद रही हैं, क्योंकि वहां से प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कच्चा तेल उपलब्ध हो रहा है।
सितंबर 2026 में भारत के मध्य पूर्व से होने वाले कच्चे तेल के आयात में बढ़ोतरी हुई और यह हिस्सेदारी युद्ध से पहले के स्तरों के करीब पहुंच गई। इस बीच रूसी तेल की खरीद में कमी आई। रूसी तेल के लिए चीन जैसे खरीदारों के साथ प्रतिस्पर्धा और अन्य आपूर्तिकर्ताओं की कीमतें भी खरीद के फैसलों को प्रभावित कर रही हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ने रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर दिया है। खरीद का स्तर बाजार की परिस्थितियों, उपलब्ध मात्रा और कीमतों के आधार पर बदल सकता है। भारत की रणनीति अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदने के विकल्प खुले रखने की है, ताकि किसी एक क्षेत्र में आपूर्ति प्रभावित होने पर घरेलू जरूरतों पर बड़ा असर न पड़े।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रिफाइनिंग क्षमता पर सरकार का जोर
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी या आपूर्ति में रुकावट का असर देश की अर्थव्यवस्था, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है। यही वजह है कि तेल खरीदते समय कीमत के साथ-साथ आपूर्ति की स्थिरता को भी अहम माना जाता है।
हरदीप पुरी ने भारत की बढ़ती रिफाइनिंग क्षमता का भी उल्लेख किया। Business Today की रिपोर्ट के अनुसार, मंत्री ने कहा कि भारत की रिफाइनिंग क्षमता 2030 तक बढ़ाकर 300 मिलियन टन प्रति वर्ष करने का लक्ष्य है, जबकि मौजूदा क्षमता लगभग 290 मिलियन टन सालाना बताई गई। इससे घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात की क्षमता भी बढ़ सकती है।
क्या भारत आगे भी रूस से तेल खरीदेगा?
भारत की रूसी तेल खरीद का भविष्य मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कीमतों, उपलब्धता, परिवहन लागत और प्रतिबंधों से जुड़े नियमों पर निर्भर करेगा। अगर रूसी तेल अन्य विकल्पों की तुलना में सस्ता और व्यावसायिक रूप से उपयुक्त रहता है, तो भारतीय रिफाइनरियां उसकी खरीद पर विचार कर सकती हैं। वहीं, खाड़ी देशों या दूसरे आपूर्तिकर्ताओं से बेहतर कीमत मिलने पर खरीद का रुख बदल सकता है।
हरदीप पुरी के बयान से स्पष्ट है कि सरकार ऊर्जा खरीद को व्यावसायिक और राष्ट्रीय हित के नजरिये से देखती है। भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि देश को पर्याप्त ईंधन मिले और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आपूर्ति व्यवस्था मजबूत बनी रहे।
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